यह तन इक दिन होय - श्री युगल प्रिया

यह तन इक दिन होय - श्री युगल प्रिया

(राग पहाड़ी - ताल कहरवा)
यह तन इक दिन होय जु छारा॥
नाम निशान न रहिहैं रंचहु, भूल जायगो सब संसारा।
काल घरी पूरी जब ह्वैहै, लगै न छिन छाँड़त भ्रम जारा॥ [1]
या माया नटनी के बसमें, भूलि गयौ सुख सिंधु अपारा।
जुगलप्रिया अजहूँ किन चेतत, मिलिहै प्रीतम प्यारा॥ [2]

- श्री युगल प्रिया

यह शरीर एक दिन अवश्य ही नष्ट होकर राख में मिल जाएगा, जिसके बाद इस संसार में तुम्हारा रत्ती भर भी नाम-निशान नहीं रहेगा और सारा जग तुम्हें भूल जाएगा। जब मृत्यु की निर्धारित घड़ी पूरी होगी, तब इस संसार के भ्रम-जाल से छूटने में एक क्षण का भी समय नहीं लगेगा। [1]

इस माया-रूपी नटनी के वश में होकर तुम उस असीम सुख के सागर भगवान को भूल गए हो। श्री युगलप्रिया जी कहती हैं कि हे मन! तुम अब भी सचेत क्यों नहीं होते? समय रहते यदि जाग गए, तो तुम्हें तुम्हारा प्रियतम प्यारा (श्रीकृष्ण) अवश्य ही प्राप्त हो जाएगा। [2]