जिन काढ़ौ ब्रजनाथ जू, मो करनी कौ छोर।
मो कर नीके कर गहौ, रसनिधि नंदकिसोर॥
- श्री रसनिधि
हे ब्रजनाथ (श्री कृष्ण)! आप मेरे कर्मों का लेखा-जोखा मत देखिए, अर्थात् मेरे दोषों पर ध्यान मत दीजिए। आप तो कृपा करके मेरे हाथ को अपने कर-कमलों से दृढ़तापूर्वक थाम लीजिए। भाव यह है कि मेरे कर्म इतने निकृष्ट हैं कि उनके बल पर मेरा उद्धार कभी संभव नहीं है, परन्तु यदि आप कृपा करके मुझे अपना मान लें और मेरा हाथ थाम लें, तभी मेरा उद्धार संभव है।
मो कर नीके कर गहौ, रसनिधि नंदकिसोर॥
- श्री रसनिधि
हे ब्रजनाथ (श्री कृष्ण)! आप मेरे कर्मों का लेखा-जोखा मत देखिए, अर्थात् मेरे दोषों पर ध्यान मत दीजिए। आप तो कृपा करके मेरे हाथ को अपने कर-कमलों से दृढ़तापूर्वक थाम लीजिए। भाव यह है कि मेरे कर्म इतने निकृष्ट हैं कि उनके बल पर मेरा उद्धार कभी संभव नहीं है, परन्तु यदि आप कृपा करके मुझे अपना मान लें और मेरा हाथ थाम लें, तभी मेरा उद्धार संभव है।

