आज समाज सहज मन भायौ - श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी, रस के पद (65)

आज समाज सहज मन भायौ - श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी, रस के पद (65)

आज समाज सहज मन भायौ।
कुँवर किसोरी गोरी भोरी, निरखि हरखि-हँसि कंठ लगायौ॥ [1]
अपने-अपने मेल मिलीं सब, तान-तरंगनि रंग बढ़ायौ।
श्रीहरिदासी रसिक-सिरोमनि, तन-मन-वचननि हियौ सिरायौ॥ [2]

- श्री ललितमोहिनी देव, श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी, रस के पद (65)

आज रंग महल की सहचरी-समाज का यह रस स्वाभाविक रूप से मन को बहुत प्रिय लग रहा है, जहाँ गौर वर्ण वाली अत्यंत भोली सुकुमारी किशोरी श्रीराधा ने श्री कृष्ण को देखकर हर्षित होते हुए उन्हें गले से लगा लिया है। [1]

रस-विलास की सब तानें अपने-अपने मेल से मिलकर, नित्यविहार की तरंगों के रंग को निरन्तर बढ़ाती चली जा रही हैं। ललिता अवतार स्वामी हरिदास जी के संग इस नित्य विहार रस का पान कर रही सखियों के तन, मन एवं प्राण पूर्णतः शीतल हो गए हैं। [2]