बिहरत दोऊ रसिकवर, सहज अजन्मा रूप।
ताहि भजौं मैं एक रस, जो हरिदासी केलि अनूप॥
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (559)
सर्वश्रेष्ठ-रसिकवर हमारे श्रीयुगल (श्यामा-कुंजबिहारी) सहज भाव से, अजन्मा होकर, नित्य-किसोर अवस्था में श्रीधाम वृन्दावन के नव-निकुंज मंदिर में नित्य विहार करते रहते हैं। श्री ललित किशोरीदेव जी कहते हैं कि श्रीस्वामी हरिदास जी महाराज की रस-पद्धति के अनुसार श्रीयुगल की जो नित्य-केलि है, मैं उसी का अनन्य, एकरस भाव से भजन करता हूँ।
ताहि भजौं मैं एक रस, जो हरिदासी केलि अनूप॥
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (559)
सर्वश्रेष्ठ-रसिकवर हमारे श्रीयुगल (श्यामा-कुंजबिहारी) सहज भाव से, अजन्मा होकर, नित्य-किसोर अवस्था में श्रीधाम वृन्दावन के नव-निकुंज मंदिर में नित्य विहार करते रहते हैं। श्री ललित किशोरीदेव जी कहते हैं कि श्रीस्वामी हरिदास जी महाराज की रस-पद्धति के अनुसार श्रीयुगल की जो नित्य-केलि है, मैं उसी का अनन्य, एकरस भाव से भजन करता हूँ।

