रसिकन की सत संगत कीजै।
जासौं विमल भाव उर आवै, हियौ प्रेम रस भींजै॥ [1]
तन मन धन पद ऊपर वारिय, नित-नित सेवा कीजै।
'भोरी' भाग्य बड़े सौं कबहूँ, जूठन लै लै जीजै॥ [2]
- श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (164)
हे श्रीराधा प्यारीजू! ऐसी कृपा कीजिए कि मुझे रसिक संतों का संग प्राप्त हो। उनके पावन संग के प्रभाव से मेरे हृदय में विशुद्ध राधा-किंकरी-भाव जागृत हो और मन निरंतर भगवद-प्रेम के रस में भीगा रहे। [1]
मेरी यही अभिलाषा है कि मैं अपना तन, मन, धन और पद, सब कुछ उन रसिकजनों को अर्पित कर निरंतर उनकी सेवा करती रहूँ। श्रीहित भोरीसखी जी कहती हैं कि उनके उच्छिष्ट से अपना जीवन-निर्वाह करने का अवसर भी सहज नहीं मिलता, ऐसा सौभाग्य तो किसी विरले शुभ क्षण में ही प्राप्त होता है। [2]
जासौं विमल भाव उर आवै, हियौ प्रेम रस भींजै॥ [1]
तन मन धन पद ऊपर वारिय, नित-नित सेवा कीजै।
'भोरी' भाग्य बड़े सौं कबहूँ, जूठन लै लै जीजै॥ [2]
- श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (164)
हे श्रीराधा प्यारीजू! ऐसी कृपा कीजिए कि मुझे रसिक संतों का संग प्राप्त हो। उनके पावन संग के प्रभाव से मेरे हृदय में विशुद्ध राधा-किंकरी-भाव जागृत हो और मन निरंतर भगवद-प्रेम के रस में भीगा रहे। [1]
मेरी यही अभिलाषा है कि मैं अपना तन, मन, धन और पद, सब कुछ उन रसिकजनों को अर्पित कर निरंतर उनकी सेवा करती रहूँ। श्रीहित भोरीसखी जी कहती हैं कि उनके उच्छिष्ट से अपना जीवन-निर्वाह करने का अवसर भी सहज नहीं मिलता, ऐसा सौभाग्य तो किसी विरले शुभ क्षण में ही प्राप्त होता है। [2]

