या रस सौं जे रहे - श्री ध्रुवदास, ब्यालीस लीला, श्रृंगार शत (3.53)

या रस सौं जे रहे - श्री ध्रुवदास, ब्यालीस लीला, श्रृंगार शत (3.53)

या रस सौं जे रहे रँगि, तिनकी पद-रज लेहु।
जिन समुझी यह बात 'ध्रुव', सुफल करी तिन देहु॥

- श्री ध्रुवदास, ब्यालीस लीला, श्रृंगार शत (3.53)

जो रसिक इस युगल-रस में सदैव रंगे रहते हैं, उनकी चरण-रज सदैव मस्तक पर धारण करनी चाहिये। श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि जिन्होंने इस रहस्य को भली-भांति समझ लिया है, उन्होंने ही अपने इस मानव-शरीर को वास्तव में सफल किया है।