(राग सारंग)
आनँद भवन वृषभान कै।
जाई सुता माई कीरति घर ऐसी, कुंवरि नहिं आन कै॥ [1]
नहिं कमला, नहिं सची, नहीं रति, सुदर रूप समान कै।
'चतुर्भुज' प्रभु हुलसी ब्रज वनिता, राधा मोहन जानिकै॥ [2]
- श्री चतुर्भुज दास
राजा वृषभान के घर में आज परम आनंद का धाम छा गया है, क्योंकि माता कीर्ति के महल में एक ऐसी लाड़ली पुत्री ने जन्म लिया है, जिसके समान अलौकिक और सुंदर कोई दूसरी किशोरी इस संसार में नहीं है। [1]
लक्ष्मी, इंद्राणी और रति में से कोई भी उनके इस अनुपम सुंदर रूप की समानता नहीं कर सकती हैं। श्री चतुर्भुजदास जी कहते हैं कि इन श्रीराधा को श्रीकृष्ण की प्राणप्रिया जानकर ब्रज की समस्त गोपियाँ मन में अत्यंत आनंदित और हर्षित हो रही हैं। [2]
आनँद भवन वृषभान कै।
जाई सुता माई कीरति घर ऐसी, कुंवरि नहिं आन कै॥ [1]
नहिं कमला, नहिं सची, नहीं रति, सुदर रूप समान कै।
'चतुर्भुज' प्रभु हुलसी ब्रज वनिता, राधा मोहन जानिकै॥ [2]
- श्री चतुर्भुज दास
राजा वृषभान के घर में आज परम आनंद का धाम छा गया है, क्योंकि माता कीर्ति के महल में एक ऐसी लाड़ली पुत्री ने जन्म लिया है, जिसके समान अलौकिक और सुंदर कोई दूसरी किशोरी इस संसार में नहीं है। [1]
लक्ष्मी, इंद्राणी और रति में से कोई भी उनके इस अनुपम सुंदर रूप की समानता नहीं कर सकती हैं। श्री चतुर्भुजदास जी कहते हैं कि इन श्रीराधा को श्रीकृष्ण की प्राणप्रिया जानकर ब्रज की समस्त गोपियाँ मन में अत्यंत आनंदित और हर्षित हो रही हैं। [2]

