हों न भई वन मृदुल लतारी - श्री ललित माधुरी जी
ऐसा कब होगा कि मैं श्री वृंदावन में कोई सुंदर लता बनूँगा जिसको प्रिया प्रियतम (श्री राधा कृष्ण) अपने अंगों का स्पर्श देते एवं जिसके नीचे लुकते छिपते हुए, एक दूसरे का आलिंगन किए हुए, क्रीड़ा करते ।
राग अलहिया बिलावल एक शुभ, सरल और शांत राग है, जिसका संबंध बिलावल ठाट से है। यह सम्पूर्ण-सम्पूर्ण जाति का राग है, जिसमें सातों शुद्ध स्वर उपयोग होते हैं। इसका वादी स्वर धैवत (ध) और संवादी स्वर गंधार (ग) होता है। इसे प्रातःकाल (6 बजे से 9 बजे) में गाया जाता है और इसका भाव मंगलकारी व शांतिपूर्ण होता है।
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ऐसा कब होगा कि मैं श्री वृंदावन में कोई सुंदर लता बनूँगा जिसको प्रिया प्रियतम (श्री राधा कृष्ण) अपने अंगों का स्पर्श देते एवं जिसके नीचे लुकते छिपते हुए, एक दूसरे का आलिंगन किए हुए, क्रीड़ा करते ।
मैं श्री वृन्दावन की भृंग क्यों नहीं बनी? यदि मैं भृंग बनती तो बिना किसी बाधा के, नित्य ही श्री बिहारिनी जू (राधारानी) के चरण कमलों के तलवों की रज के मकरंद-रस का पान करती रहती।
युगलकिशोर श्रीश्यामा-कुंजविहारी (अपने केलि-विलास-द्वारा) श्रीयमुनाजी के जल को निर्मल बना रहे हैं। पहले इन प्रियालाल ने उबटन करके यमुना-जल में स्नान किया है, फिर वस्त्राभूषण धारण करके ऐसे सज गये हैं, जैसे एक ही श्रृंगार रस दोनों ओर (दो रूपों में) सज्जित हो गया हो।