देखो देखो ब्रजकी बीथिनि बीथिनि खेलत हैं हरि होरी - श्री गदाधर भट्ट जी की वाणी (68)
अरी सखी! देखो, ब्रज की हर एक गली में आनंद के सागर स्वयं हरि, प्रेमपूर्वक होली खेल रहे हैं। मधुर गीतों, हास-परिहास और लीलाओं के मध्य, हजारों सखाओं के संग वे रंगों की इस उत्सवमयी रसधारा में मग्न हो रहे हैं।
