प्राण बसी वही माधुरी मूरति - कवि मुरली
श्यामसुंदर की मधुर छवि मेरे मन को इतनी भा गई है कि अब उन्हें देखे बिना पलभर भी चैन नहीं पड़ता। क्या करूँ, ऐसी विवशता हो गई है कि कुल की मर्यादा और लज्जा से भी हाथ धो बैठी हूँ।
भक्त कवि श्री मुरली जी
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श्यामसुंदर की मधुर छवि मेरे मन को इतनी भा गई है कि अब उन्हें देखे बिना पलभर भी चैन नहीं पड़ता। क्या करूँ, ऐसी विवशता हो गई है कि कुल की मर्यादा और लज्जा से भी हाथ धो बैठी हूँ।