कूरेश स्वामी

कूरेश स्वामी (1010 ईस्वी), जिन्हें कुरत्ताळ्वान या श्रीवत्सांक मिश्र के नाम से भी जाना जाता है, श्री रामानुजाचार्य के एक प्रमुख कृपापात्र शिष्य थे। वे अपने गुरु के प्रति अटूट भक्ति और त्याग के लिए प्रसिद्ध थे।

2 लेख उपलब्ध हैं

  1. हां जन्म तासु सिकतासु मया - श्री कूरेश स्वामी (ईस्वी 1010, श्री रामानुजाचार्य के शिष्य)

    हे श्यामसुन्दर! हाय, हम तो वृन्दावन की रज का एक कण भी न बन सके; हे प्रभु! यह कैसी तेरी प्रतिकूलता है? रासलीला के समय जब गोपियाँ श्रीकृष्ण-विरह की व्याकुलता से दग्ध थीं, तब उसी वृन्दावनधाम की पावन रज के स्पर्श से उन्होंने अपनी विरहाग्नि से जली हुई देह की ज्वाला को शान्त किया; वह रज, जो आपके परम-पावन चरणचिह्नों से आच्छादित है, उसके स्पर्श मात्र से विरहजन्य संताप क्षणभर में दूर हो जाता है।

  2. वृन्दावने स्थिरचरात्मक कीट-दुर्वा - श्री कूरेश स्वामी

    वृन्दावन में, स्थिर और चर जीवों में, कीट से लेकर दूर्वा घास तक में हमारा जन्म न हो पाया । हाय! हम कितने पापी हैं! हे प्रभु, अब हम फिर कब आपके परम पावन धाम का आश्रय प्राप्त करेंगे?