मान माधुरी [प्रेम रस मदिरा]

मान माधुरी प्रेम रस मदिरा का 16वाँ अध्याय है जो श्री राधा की मान लीला को समर्पित है।जब श्री राधा मान करती हैं, तो कृष्ण उन्हें विभिन्न उपायों से मनाने की कोशिश करते हैं, जिसकी माधुरी का वर्णन इस अध्याय में किया गया है। लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

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  1. कुँवरि बिनु, अब तो रह्यो न जाय - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, मान माधुरी (28)

    हाय ! हाय !! किशोरी जी के बिना अब तो किसी प्रकार भी रहा नहीं जाता । अरी सखियों ! जो कोई किशोरी जी को मना लाये उस पर मैं अपने करोड़ों प्राण न्यौछावर कर दूँगा ।