प्रेम माधुरी [प्रेम रस मदीरा]

प्रेम माधुरी, प्रेम रस मदिरा का छटा अध्याय है जिसमें विशेष रूप प्रेम माधुरी का वर्णन किया गया है । रचयिता: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

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  1. बलि जाऊं प्रेम-रस-सार की - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, प्रेम माधुरी (7)

    श्री राधा-कृष्ण के प्रेम की मधुरता पर मैं बार-बार स्वयं को न्योंछावर करता हूँ । रसिकों के चूड़ामणि प्रिय श्री श्यामसुंदर एवं उनकी प्राण-प्यारी रस की खान श्री राधिका जी पर मैं स्वयं को अनंत बार न्योंछावर करता हूँ । प्रिय श्री श्यामसुन्दर सौन्दर्य के मूर्तिमान स्वरुप हैं एवं श्री राधा श्रृंगार की ।