प्रेम पचासा [श्री लाल बलबीर]

प्रेम पचासा, श्री लाल बलबीर द्वारा रचित ग्रंथ ब्रज विनोद का 40वां अध्याय है, जिसमें दिव्य प्रेम से समंधित लगभग 54 सवैये और कवित्त हैं।

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  1. अब तौ बदनाम भई आली ब्रज मण्डल में - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, प्रेम पचासा (42)

    हे सखी, अब तो मैं ब्रज मंडल में बदनाम हो चुकी हूँ। गुरुजनों की लज्जा आदि खो चुकी हूँ, अब चाहे वे मुझसे नाराज़ ही क्यों न हों, मुझे कोई परवाह नहीं।