रसिक अनन्य परचावली

‘रसिक-अनन्य-परचावली’ ग्रन्थ में श्रीहित हरिवंश महाप्रभु तथा उनकी वंश-परम्परा के रसिकों का वर्णन पूज्य चाचा हित वृन्दावनदास जी द्वारा किया गया है। इसमें कुल ५१ दोहे एवं पद संकलित हैं।

2 लेख उपलब्ध हैं

  1. यह रस अनुभव जनित है - चाचा श्री वृंदावन दास जी

    यह रस प्रत्यक्ष अनुभव से ही प्राप्त होता है, जिसके लिए मन में प्रगाढ़ प्रेम होना आवश्यक है। श्रीहित हरिवंश महाप्रभु की कृपा से इस रस की प्राप्ति सहज और सुलभ रीति से हो जाती है।

  2. जो मारग खोजत फिरत अजहूँ शेष महेश - चाचा वृन्‍दावनदासजी, रसिक अनन्य परचावली (32)

    जिस वृन्दावन-रस रूपी मार्ग को ब्रह्मा, शेष, शिव आदि भी खोजते फिरते हैं, उसी अद्भुत मार्ग को आपने इस पृथ्वी पर दुर्लभ से सुलभ बना दिया। हे रसिक-शिरोमणि, श्रीहित हरिवंश महाप्रभु! आपकी जय हो।