रसिक कर्णाभरण

‘रसिक-कर्णाभरण’ ग्रन्थ श्रीमनोहरदास जी द्वारा रचित है, जिसमें ब्रज एवं श्रीराधा-कृष्ण की लीलाओं और महिमा से सम्बन्धित 386 दोहे एवं पद संकलित हैं। यह ब्रज भाषा में लिखी गई है।

2 लेख उपलब्ध हैं

  1. कौन कहै को सुनें लाल कछुवै नहिं जानत - श्री मनोहर दास, रसिक कर्णाभरण (163)

    कौन कहे और कौन सुने, लालजी (श्री कृष्ण) को श्री राधा के अतिरिक्त कुछ भी सुध-बुध नहीं है। वे अपनी प्राणप्रिया, एकमात्र स्वामिनी श्री राधिका जू के अभाव में इस समस्त संसार को सर्वथा शून्य और सारहीन अनुभव करते हैं।

  2. राधा कृष्ण सरोवर जुगल गोवर्धन नैना - श्री मनोहर दास, रसिक कर्णाभरण (356)

    गिरिराज गोवर्धन की दोनों आँखें श्री राधा कुंड और श्री श्याम कुंड रूपी दो युगल कुंड हैं। इनकी ऐसी दिव्य महिमा है कि ये साक्षात प्रिया-प्रियतम (श्री राधा-कृष्ण) के ही स्वरूप हैं। इनकी तुलना किसी और से नहीं की जा सकती।