नयनं गलदश्रुधारया - श्री चैतन्य महाप्रभु, शिक्षाष्टकम (6)
हे प्रभु ! आपका नाम लेने पर कब मेरे नेत्रों से अश्रुओं की धारा बहेगी, कब आपका नामोच्चारण मात्र से ही मेरा कंठ गद गद होकर अवरुद्ध हो जायेगा और मेरा शरीर रोमांचित हो उठेगा ।
शिक्षाष्टकम सोलवीं शताब्दी के गौड़ीय वैष्णव हिंदू संस्कृत भाषा में रचित आठ छंदों की प्रार्थना है। शिक्षाष्टकम में भक्ति योग दर्शन का सार है। लेखक- श्री चैतन्य महाप्रभु
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हे प्रभु ! आपका नाम लेने पर कब मेरे नेत्रों से अश्रुओं की धारा बहेगी, कब आपका नामोच्चारण मात्र से ही मेरा कंठ गद गद होकर अवरुद्ध हो जायेगा और मेरा शरीर रोमांचित हो उठेगा ।
चित्त रूपी दर्पण को स्वच्छ करने वाले, भव रूपी महान अग्नि को शांत करने वाले, चन्द्र किरणों के समान श्रेष्ठ, विद्या रूपी वधु के जीवन स्वरुप, आनंद सागर में वृद्धि करने वाले, प्रत्येक शब्द में पूर्ण अमृत के समान सरस, सभी को पवित्र करने वाले श्रीकृष्ण कीर्तन की उच्चतम विजय हो॥
हे राधाकृष्ण ! न मैं धन संग्रह करने की इच्छा रखता हूँ, न सुंदर स्त्रियां की कामना रखता हूँ, न मुझे अनेक शिष्य रखने की चाह है। मुझे तो केवल जन्म-जन्मांतर तक आपकी निष्काम सेवा करने की अभिलाषा है।
हे प्रभु, आपने अपने अनेक नामों में अपनी शक्ति भर दी है, जिनका किसी समय भी स्मरण किया जा सकता है। हे भगवन्, आपकी इतनी कृपा है परन्तु मेरा इतना दुर्भाग्य है कि मुझे उन नामों से प्रेम ही नहीं है