विरह माधुरी [प्रेम रस मदीरा]

प्रेम माधुरी, प्रेम रस मदिरा का उन्नीसवाँ अध्याय है जिसमें विशेष रूप विरह माधुरी का वर्णन किया गया है । रचयिता: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

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  1. कहो पिय किन तोहिं रसिक बनायो - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, विरह माधुरी (80)

    एक सखी कहती है कि हे प्रियतम ! यह तो बताओकि तुमको रसिक बनाया किसने है? तुम पूर्व शूकरावतार में अपने सौन्दर्य के बल पर कब 'मदन मोहन' कहलाये थे? मत्स्यावतार में तुमने मछली का शरीर धारण करके जल ही में रहते हुए कब गोपियों का चीर हरण किया था?