वृंदावन शतक प्रथम
वृंदावन शतक प्रथम दो भागों में से पहला है जिसमें श्री ललित किशोरी द्वारा रचित ग्रंथ अभिलाष माधुरी में 100 श्लोकों के माध्यम से वृंदावन की दिव्य महिमा का वर्णन किया गया है।
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आनदेश के गमन को - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, वृंदावन शतक प्रथम (34)
हे भाई! अपने मन में किसी अन्य स्थान या देश में जाने का विचार स्वप्न में भी न लाओ। श्री धाम वृन्दावन का यह परम-पावन वास और यहाँ होने वाला श्री युगल-सरकार का नित्य-विहार भला अन्यत्र कहाँ सुलभ है? अतः जो परम सौभाग्य तुम्हें यहाँ प्राप्त है, उसका त्याग कर कहीं और जाने की कल्पना भी मत करो।
आन देश की इमरती - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, वृंदावन शतक प्रथम (16)
दूसरे स्थानों के व्यंजनों के बारे में सुनकर मेरे मुंह में कड़वाहट आ जाती है, क्योंकि वृंदावन की रज मिश्री से भी अधिक मीठी है।
पशू पखेरू होहु कछु - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, वृंदावन शतक प्रथम (24)
मैं अंचल फैलाकर यही वरदान माँगता हूँ कि मुझे सदा वृंदावन-वास प्राप्त हो; चाहे उसके लिए मुझे पशु, पक्षी, पत्थर, जल या तृण का ही रूप क्यों न धारण करना पड़े।