राधे आन पड़ो तेरे द्वार - श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (33)
हे राधे! मैं तुम्हारे द्वार पर आन पड़ी हूँ । हे वृषभानु नंदिनी! तुम्हें छोड़कर अब मैं किसे पुकारूँ? मैं संसार-सागर में डूब रही हूँ, कृपया अपनी कृपा की नाव से मुझे पार लगा दो।
