हम वासी बरसाने के - श्री ललित माधुरी
हम बरसाने के निवासी हैं। श्री चैतन्य महाप्रभु की परम्परा के खास उपासक हैं जिनका संबंध “राधा-गोविन्द” से है।
राग लावणी एक शास्त्रीय राग है, जिसका संबंध खमाज ठाट से है और इसका उपयोग विशेष रूप से महाराष्ट्र की लोकनृत्य शैली लावणी में होता है। इसकी जाति औड़व (पंचस्वरी) है, जिसमें आरोह – सा रे ग प नि सा और अवरोह – सा नि प ग रे सा होता है। इसका वादी स्वर गंधार (ग) और संवादी स्वर निषाद (नि) है। यह राग शाम के पहले प्रहर (6 बजे से 9 बजे तक) गाया जाता है। इसमें चंचलता, लयात्मकता और श्रृंगारिकता का मधुर संयोग होता है।
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हम बरसाने के निवासी हैं। श्री चैतन्य महाप्रभु की परम्परा के खास उपासक हैं जिनका संबंध “राधा-गोविन्द” से है।
ऐसा कब होगा जब मैं श्री राधा मनमोहन नाम का रटन कर अपना जीवन बिताऊँगा एवं दिव्य दम्पति श्री युगल सरकार की लीला रस को लिख लिखकर नैनों से आँसु बहाऊँगा ?
हम अष्ट सिद्धि और नौ प्रकार की निधियों को बेपरवाह हो कर लुटा देंगे । हम चौदह भवन और त्रिलोक की संपति को भी बहा देंगे ।