राग लावनी

राग लावणी एक शास्त्रीय राग है, जिसका संबंध खमाज ठाट से है और इसका उपयोग विशेष रूप से महाराष्ट्र की लोकनृत्य शैली लावणी में होता है। इसकी जाति औड़व (पंचस्वरी) है, जिसमें आरोह – सा रे ग प नि सा और अवरोह – सा नि प ग रे सा होता है। इसका वादी स्वर गंधार (ग) और संवादी स्वर निषाद (नि) है। यह राग शाम के पहले प्रहर (6 बजे से 9 बजे तक) गाया जाता है। इसमें चंचलता, लयात्मकता और श्रृंगारिकता का मधुर संयोग होता है।

3 संकीर्तन उपलब्ध हैं

  1. रटत रटत राधा-मनमोहन - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, विनय (21)

    ऐसा कब होगा जब मैं श्री राधा मनमोहन नाम का रटन कर अपना जीवन बिताऊँगा एवं दिव्य दम्पति श्री युगल सरकार की लीला रस को लिख लिखकर नैनों से आँसु बहाऊँगा ?

  2. अष्टसिद्धि नवनिधि के सुखको वेपरवाहि लुटावेंगे - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (119)

    हम अष्ट सिद्धि और नौ प्रकार की निधियों को बेपरवाह हो कर लुटा देंगे । हम चौदह भवन और त्रिलोक की संपति को भी बहा देंगे ।