सखी सबै उडगन मनौं - श्रीध्रुवदास जी, बयालीस लीला, आनंदाष्टक लीला
श्री वृंदावन नित्य विहार के नित्य नव निभृत निकुञ्ज विलासी चतुर्व्यूह परिकर का संक्षिप्त परिचयात्मक रूपक प्रस्तुत करते हुए श्रीहित ध्रुवदास जी कहते हैं कि आनंद धाम श्रीवृंदावन ही मानो एक निरभ्र, प्रेमाकाश है।
