अनन्य मोदिनी

अनन्य मोदिनी श्री प्रियादास जी द्वारा रचित ग्रंथ है जिसमें अनन्य निष्ठा का वर्णन है।

2 लेख उपलब्ध हैं

  1. अन्य देव पूजा तजै भजै युगल दृढ़ हेत- श्री प्रियादास जी, अनन्य मोदिनी (14)

    जो साधक अन्य देवतायों की पूजा को त्याग कर, दृढ़ भाव से श्री राधा-कृष्ण (युगल) का ही अनन्य भजन करता है, उसकी भक्ति उसी प्रकार फलती-फूलती है जैसे कोई किसान खेत में हल चलाकर बीज बोता है और उसे अपनी हथेलियों से सँवारता है, धीरे-धीरे वह खेत हरा-भरा हो जाता है।

  2. श्री वृन्दावन धाम में, बसै निरन्तर देह - श्री प्रियादास जी, अनन्य मोदिनी (9)

    साधक को यह प्रयत्न करना चाहिए कि उसकी शरीर नित्य श्री वृन्दावन धाम में ही रहे; पर यदि किसी दुर्भाग्यवश (किसी विवशता के कारण) ऐसा संभव न हो, तो जहाँ भी वह हो, वहीं से दृढ़ और अनन्य भाव से अपने मन में श्री वृन्दावन के प्रति प्रेम बढ़ाता रहे।