भाव महिमा अंग [श्री रूप माधुरी]

'भाव महिमा अंग' श्री रूप माधुरी जी द्वारा रचित 'श्री रूप माधुरी जी की वाणी' ग्रन्थ का सातवाँ अध्याय है जिसमें भाव से सम्बंधित 10 दोहे संकलित हैं।

2 लेख उपलब्ध हैं

  1. भाव अनोखी वस्तु है जो कर जाने कोय - श्री रूप माधुरी जी की वाणी, भाव महिमा अंग (5)

    ‘भाव’ अर्थात आंतरिक भावना एक विलक्षण तत्व है, जिसका वास्तविक मर्म कोई विरला व्यक्ति ही अनुभूति द्वारा जान पाता है। श्री रूपमाधुरी जी कहते हैं कि संसार में अनुभव होने वाले सुख और दुःख का मूल कारण मनुष्य के अपने भाव ही हैं।