भोली गोपी

भोली गोपी, श्री वृंदावन के एक रसिक भक्त कवि

3 लेख उपलब्ध हैं

  1. अब मैं वृन्दावन में बसूँगी - श्री भोली गोपी

    अब मैं वृंदावन में सदा वास करूँगी । संतों के संग बैठ बैठ कर अपने मन को श्री राधे जू के रंग में डूबा दूँगी । राधे नाम का रस पी पीकर लोक लाज का सर्वथा त्याग कर दूंगी ।

  2. सखी री मेरो प्यारो है नन्दलाल - श्री भोली गोपी जी

    हे सखिरी, मेरे नंदलाल अत्यंत प्यारे हैं जिनके शीश पर मोर मुकुट है, वक्ष स्थल पर पीताम्बर है और जिनके घुंघराले बाल हैं । हाथों में कंगन हैं, होठों पर मुरली, और नैना चंचल एवं विशाल हैं ।