ब्रज लीला [बयालीस लीला]

ब्रज लीला, श्री हित ध्रुवदास द्वारा रचित ग्रंथ बयालीस लीला का 38वाँ अध्याय है जिसमें ब्रज की लीलाओं का वर्णन है ।

2 लेख उपलब्ध हैं

  1. कुँवरि-कुँवर दोउ रसिक वर, सब सखियनि के प्रान - श्री ध्रुवदास, ब्यालीस लीला, ब्रज लीला (188)

    युगल रसिकवर किशोर एवं किशोरी समस्त सखियों के प्राण हैं । इस रसिक दम्पति का सुख ही तत्सुखमयी सखियों का आस्वाद सुख है । इस सुख के अतिरिक्त इनकी अन्य कोई गति-मति ही नहीं है ।

  2. रसिक सिरोमनी रसिक पिय, जानत रस की रीति - श्री ध्रुवदास, ब्यालीस लीला, ब्रज लीला (131)

    रसिक शिरोमणि श्री कृष्ण चन्द्र रस रीति के परम ज्ञाता हैं और उन्होंने प्रभुत्व को त्याग कर प्रेम को महत्व दिया है । तभी तो वे प्रेम के वशीभूत होकर परम दीन हो जाते हैं ।