चैतन्य महाप्रभु

चैतन्य महाप्रभु (१८ फरवरी, १४८६-१५३४) वैष्णव धर्म के भक्ति योग के परम प्रचारक एवं भक्तिकाल के प्रमुख कवियों में से एक हैं। इन्होंने वैष्णवों के गौड़ीय संप्रदाय की आधारशिला रखी। यह भी कहा जाता है, कि यदि गौरांग ना होते तो वृंदावन आज तक एक मिथक ही होता।वैष्णव लोग तो इन्हें श्रीकृष्ण का राधा रानी के संयोग का अवतार मानते हैं।

8 लेख उपलब्ध हैं

  1. नयनं गलदश्रुधारया - श्री चैतन्य महाप्रभु, शिक्षाष्टकम (6)

    हे प्रभु ! आपका नाम लेने पर कब मेरे नेत्रों से अश्रुओं की धारा बहेगी, कब आपका नामोच्चारण मात्र से ही मेरा कंठ गद गद होकर अवरुद्ध हो जायेगा और मेरा शरीर रोमांचित हो उठेगा ।

  2. शिक्षाष्टकम - श्री चैतन्य महाप्रभु

    चित्त रूपी दर्पण को स्वच्छ करने वाले, भव रूपी महान अग्नि को शांत करने वाले, चन्द्र किरणों के समान श्रेष्ठ, विद्या रूपी वधु के जीवन स्वरुप, आनंद सागर में वृद्धि करने वाले, प्रत्येक शब्द में पूर्ण अमृत के समान सरस, सभी को पवित्र करने वाले श्रीकृष्ण कीर्तन की उच्चतम विजय हो॥

  3. शुक और सारी की प्रेम भरी कलह - गोवर्धन

    एक बार चैतन्य महाप्रभु राधा कृष्ण के चिंतन युक्त वृंदावन की परिक्रमा पर थे, और वह गोवर्धन के पास से हो कर परिक्रमा कर रहे थे । कुछ आगे बढ़ने पर चैतन्य महाप्रभु जी ने देखा आमने-सामने वृक्ष की डालियों पर शुक सारी परस्पर प्रेम-कलह करते हुए श्री राधा कृष्ण युगल का गुणगान कर रहे हैं।

  4. श्री कृष्ण के दो अलग-अलग अवतार श्री चैतन्य महाप्रभु जी रूप गोस्वामी को बताते हैं

    श्री रूप गोस्वामी ने एक बार विचार किया, "श्री चैतन्य महाप्रभु जी की अंततः हृदय की इच्छा को पूरा करने के लिए, मैं एक नाटक लिखूंगा ।

  5. श्री चैतन्य महाप्रभु श्री राधा-कुंड और श्याम-कुंड की खोज करते हैं

    गोवेर्धन में ये दो दैविक कुंड राधा-कुंड और श्याम-कुंड जो खूबसूरत जंगलों से घिरे हुए हैं और ऋषि और देवताओं को आकर्षित करते हैं। वृंदावन के अन्य जंगलों का दौरा करने के बाद, चैतन्य महाप्रभु यहां आए और इस तमाल के वृक्ष के नीचे बैठे। उन्होंने अरिष्ट-ग्राम के निवासियों से उन दो कुंडो के बारे में पूछा लेकिन कोई भी जवाब नहीं दे सका। मथुरा के ब्राह्मण भी नहीं जानते थे।

  6. न धनं न जनं न सुन्दरीं कवितां वा जगदीश कामये ​- श्री शिक्षाष्टकम् (चैतन्यमहाप्रभु)

    हे राधाकृष्ण ! न मैं धन संग्रह करने की इच्छा रखता हूँ, न सुंदर स्त्रियां की कामना रखता हूँ, न मुझे अनेक शिष्य रखने की चाह है। मुझे तो केवल जन्म-जन्मांतर तक आपकी निष्काम सेवा करने की अभिलाषा है।

  7. नाम्नामकारि बहुधा निज सर्व शक्ति - श्री चैतन्य महाप्रभु, शिक्षाष्टकं (2)

    हे प्रभु, आपने अपने अनेक नामों में अपनी शक्ति भर दी है, जिनका किसी समय भी स्मरण किया जा सकता है। हे भगवन्, आपकी इतनी कृपा है परन्तु मेरा इतना दुर्भाग्य है कि मुझे उन नामों से प्रेम ही नहीं है