चतुःश्लोकी [श्री वल्लभाचार्य]

श्री वल्लभाचार्य जी ने अपने शिष्य श्री राणा व्यास एवं श्री भगवानदास को यह चार दोहों के उपदेश दिए थे । इन चार दोहों में धर्म, अर्थ, काम, एवं मुक्ति का पूर्ण रहस्यमय भावार्थ एवं व्याख्या छिपी है । श्री कृष्ण की भक्ति ही वास्तविक धर्म एवं धन है ।

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  1. यदि श्रीगोकुलाधीशो धृतः सर्वात्मना हृदि - श्री वल्लभाचार्य, चतुः श्लोकी (3)

    हे मन, यदि तूने श्रीगोकुल के अधिपति श्री कृष्ण को सम्यक प्रकार से अपने हृदय में धारण कर लिया है, तो फिर लौकिक और वैदिक फलों की क्या आवश्यकता रह जाती है?

  2. सर्वदा सर्वभावेन भजनीयो - श्री वल्लभाचार्य, चतुः श्लोकी (1)

    ब्रजेश्वर श्री कृष्ण को सर्व भाव से सर्वदा भजन करना चाहिए । यह ही तुम्हारा एकमात्र धर्म है । इसके अतिरिक्त अन्य कोई दूसरा धर्म नहीं है ।