अतः सर्वात्मना शश्वद् - श्री वल्लभाचार्य, चतुः श्लोकी (4)
इसलिए सब प्रकार से सर्वदा श्रीगोकुलेश्वर के चरणकमलों का स्मरण और भजन कभी भी नहीं छोड़ना चाहिए, यही मेरा दृढ़ मत है।
श्री वल्लभाचार्य जी ने अपने शिष्य श्री राणा व्यास एवं श्री भगवानदास को यह चार दोहों के उपदेश दिए थे । इन चार दोहों में धर्म, अर्थ, काम, एवं मुक्ति का पूर्ण रहस्यमय भावार्थ एवं व्याख्या छिपी है । श्री कृष्ण की भक्ति ही वास्तविक धर्म एवं धन है ।
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इसलिए सब प्रकार से सर्वदा श्रीगोकुलेश्वर के चरणकमलों का स्मरण और भजन कभी भी नहीं छोड़ना चाहिए, यही मेरा दृढ़ मत है।
हे मन, यदि तूने श्रीगोकुल के अधिपति श्री कृष्ण को सम्यक प्रकार से अपने हृदय में धारण कर लिया है, तो फिर लौकिक और वैदिक फलों की क्या आवश्यकता रह जाती है?
ब्रजेश्वर श्री कृष्ण को सर्व भाव से सर्वदा भजन करना चाहिए । यह ही तुम्हारा एकमात्र धर्म है । इसके अतिरिक्त अन्य कोई दूसरा धर्म नहीं है ।