होरी माधुरी [प्रेम रस मदिरा]

श्री होरी माधुरी प्रेम रस मदिरा का अठारहवाँ अध्याय है जिसमें होली त्योहार के दिव्य रस से भरे पदों का संकलन है, जिसे जगदगुरु श्री कृपालु जी महाराज ने प्रेम रस मदिरा नामक ग्रंथ में लिखा है।

2 लेख उपलब्ध हैं

  1. सखी सब, ह्वै गये लालहिं लाल - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, होरी माधुरी (24)

    एक सखी वृन्दावन की होली के दृश्य का वर्णन करती हुई अपनी अन्तरंग सखी से कहती है कि अरी सखी ! युगल सरकार की होली में पिचकारियों से ऐसा रंग चला और ऐसा गुलाल उड़ा कि जड़-चेतन सब लाल हो गये।

  2. डारो डारो री, रंग बनवारी पै - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, होरी माधुरी (6)

    होली के अवसर पर एक सखी अन्य समस्त सखियों से कहती है कि चलो चलो सब लोग श्यामसुन्दर के ऊपर रंग डालो । लाल - लाल गुलाल उनके गालों में मल दो एवं अबीर उनके घुँघराले बालों में मल दो ।