यत्र वृन्दावने पुण्ये - नारदपुराण, उत्तरार्धः (80.82)
परम पावन श्रीवृन्दावन-धाम के नर-नारी, वानर, कृमि, कीट-पतंग, खग (पक्षी), मृग (पशु), वृक्ष और पर्वत भी निरन्तर श्रीराधा-कृष्ण नाम का उच्चारण (संकीर्तन) करते रहते हैं ।
नारद पुराण हिन्दु धर्म का एक प्रमुख पुराण है।
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परम पावन श्रीवृन्दावन-धाम के नर-नारी, वानर, कृमि, कीट-पतंग, खग (पक्षी), मृग (पशु), वृक्ष और पर्वत भी निरन्तर श्रीराधा-कृष्ण नाम का उच्चारण (संकीर्तन) करते रहते हैं ।
वृंदावन का सदा दर्शन करना चाहिये, वृंदावन जाना चाहिए, वृंदावन का सदा सेवन करना चाहिये ओर वृंदावन का सदा ध्यान करना चाहिये । इस वृंदावन के समान अन्य कोई लोक नहीं जिसकी महीमा इतनी अधिक है ।
श्री कृष्ण नारद से कहते हैं: मैं यह बार बार शपथ लेकर कहता हूँ बिना राधिका जी की कृपा के मेरी कृपा नहीं हो सकती है । श्रीराधिका की अहेतु की कृपा से ही उनकी सखियों का संग प्राप्त होता है। उन सखियों की कृपा से ही सखी भाव मिलता है । इसी क्रम से ही केवल सखी भाव को प्राप्त किया जा सकता है, अन्य कोई उपाय नहीं है ।
श्री कृष्ण कहते हैं: "हे नारद! मैं आपको सत्य कह रहा हूँ और बार बार, फिर से, सत्य बार-बार कहता हूं -" श्री राधारानी की कृपा के बिना मेरी कृपा कोई भी प्राप्त नहीं कर सकता"।