नारद पुराण

नारद पुराण हिन्दु धर्म का एक प्रमुख पुराण है।

4 लेख उपलब्ध हैं

  1. यत्र वृन्दावने पुण्ये - नारदपुराण, उत्तरार्धः (80.82)

    परम पावन श्रीवृन्दावन-धाम के नर-नारी, वानर, कृमि, कीट-पतंग, खग (पक्षी), मृग (पशु), वृक्ष और पर्वत भी निरन्तर श्रीराधा-कृष्ण नाम का उच्चारण (संकीर्तन) करते रहते हैं ।

  2. दृश्यं गम्यं च संसेव्यं ध्येयं वृन्दावनं सदां - नारदपुराण, उत्तरार्धः (80.86)

    वृंदावन का सदा दर्शन करना चाहिये, वृंदावन जाना चाहिए, वृंदावन का सदा सेवन करना चाहिये ओर वृंदावन का सदा ध्यान करना चाहिये । इस वृंदावन के समान अन्य कोई लोक नहीं जिसकी महीमा इतनी अधिक है ।

  3. सखी भाव का प्रादुर्भाव - नारद पुराण

    श्री कृष्ण नारद से कहते हैं: मैं यह बार बार शपथ लेकर कहता हूँ बिना राधिका जी की कृपा के मेरी कृपा नहीं हो सकती है । श्रीराधिका की अहेतु की कृपा से ही उनकी सखियों का संग प्राप्त होता है। उन सखियों की कृपा से ही सखी भाव मिलता है । इसी क्रम से ही केवल सखी भाव को प्राप्त किया जा सकता है, अन्य कोई उपाय नहीं है ।

  4. सत्यम् सत्यम् पुना, सत्यं सत्यं इव पुना पुना - नारद पुराण

    श्री कृष्ण कहते हैं: "हे नारद! मैं आपको सत्य कह रहा हूँ और बार बार, फिर से, सत्य बार-बार कहता हूं -" श्री राधारानी की कृपा के बिना मेरी कृपा कोई भी प्राप्त नहीं कर सकता"।