प्रीति चौवनी [बयालीस लीला]

प्रीति चौवानी श्री हित ध्रुवदास द्वारा रचित बयालीस लीला का नौवां अध्याय है जिसमें दिव्य प्रेम को समर्पित 54 छंद हैं ।

2 लेख उपलब्ध हैं

  1. ऐसौ प्रेम न कहूँ ‘ध्रुव’, है वृंदावन माहिं - श्री ध्रुवदास, प्रीति चौवनी (21)

    ऐसा अद्भुत प्रेम-रस केवल वृन्दावन के नित्य-विहार में ही है, अन्यत्र कहीं नहीं; जहाँ श्री श्यामा-श्याम नित्य संयोग में होते हुए भी (अर्थात् निमिष-काल का भी वियोग न होते हुए) उनमें अतृप्ति-रूपी उत्कंठा, अर्थात् विरह, सदा बना रहता है।

  2. रहन देत नहिं और रस यहै प्रेम की टेक - श्री ध्रुवदास, प्रीति चौवनी (12)

    वृंदावन के प्रेमी संत कहते हैं कि प्रेम का यह हठ होता है कि वह अन्य किसी रस का समावेश नहीं करने देता। प्रेम का यह सहज स्वभाव है कि यह दो को एक कर देता है अर्थात् प्रेमास्पद एवं प्रेमी को एक बना देता है।