प्रेम लता [बयालीस लीला]

प्रेम लता 'बयालीस लीला' ग्रन्थ का अनुभाग है जिसे श्री हित ध्रुवदास द्वारा लिखा गया है जिसमें प्रेम रस की मधुरता का वर्णन किया गया है।

3 लेख उपलब्ध हैं

  1. अतिहिं लालची लाल पिय - श्री ध्रुवदास, ब्यालीस लीला, अनुराग लता (34)

    लाल जी (श्री कृष्ण) श्री राधा के रूप का रसास्वादन करने के लिए अत्यंत लालची रहते हैं, वे सदा उनको निरंतर निहारते रहते हैं, फिर भी उन्हें तृप्ति नहीं होती। प्रिया जी के सौंदर्य रूपी वन का दर्शन कर उनके नेत्र इस प्रकार उलझ गए हैं कि वे वहाँ से हटने का नाम ही नहीं लेते।

  2. निसि दिन तौ जाँचत रहौ, वृन्दावन रस-रैन - श्री ध्रुवदास, ब्यालीस लीला, अनुराग लता (68)

    मैं रात-दिन वृन्दावन की रस-रेणु से यही याचना करता हूँ कि लाड़िली-लाल रूपी रसिक युगल दम्पति की प्रति क्षण नवनवीन छवि-छटा मेरे नेत्रों में सदा के लिए बस जाए।

  3. लाल लाड़िली प्रेम तें - श्री ध्रुवदास, ब्यालीस लीला, प्रेम लता (46)

    श्री राधा-कृष्ण के परस्पर प्रेम से भी अधिक रसमय इन नित्य-विहार की सखियों का प्रेम है। ये सखियाँ अपने निज प्रीति-रस में इस प्रकार मग्न और अटकी हुई हैं कि कोई भी नियम, मर्यादा या विधि-विधान उन्हें स्पर्श तक नहीं कर पाता। उनका प्रेम समस्त बंधनों से परे, स्वसुख से अछूता, केवल युगल के तत्सुख में ही स्थित है।