मनमोहन तें बिछुरी जबसौं - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, प्रेम माधुरी (116)
एक विरहिणी गोपी अपनी पीड़ा व्यक्त करती है कि जब से प्राणप्रिय मनमोहन से बिछुड़ी हूँ, मेरा यह शरीर नित्य अश्रुओं की धारा से प्रक्षालित (धुलता) होता रहता है।
प्रेम माधुरी श्री भारतेंदु हरिशचंद्र द्वारा रचित भारतेंदु ग्रंथावली का आठवाँ अध्याय है जिसमें श्री श्यामाश्याम की कुञ्ज-लीला सम्बंधित 131 मधुर छंदों की रचना की गयी है।
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एक विरहिणी गोपी अपनी पीड़ा व्यक्त करती है कि जब से प्राणप्रिय मनमोहन से बिछुड़ी हूँ, मेरा यह शरीर नित्य अश्रुओं की धारा से प्रक्षालित (धुलता) होता रहता है।
एक भक्त बाँके बिहारी से मान करके प्रेमपूर्वक कहता है कि सर्वप्रथम तो आप स्वयं को दीनदयाल कहलवा कर दीनजनों से नेह बढ़ाते हो। उसी प्रकार वेदों में भी स्वयं को करुणा निधि नाम से कहलवाते हो।