रसिक शिरोमनि सांवरो गौरी अद्भुत रूप - श्री रूपरसिक देवाचार्य, रसिक मंजरी (2)
रसिक-शिरोमणि श्यामसुन्दर और अद्भुत रूप-लावण्य से युक्त गौरवर्णा श्री राधा, श्रीधाम वृन्दावन के गहन कुंजों में युगल रूप से विविध रसपूर्ण लीलाओं में नित्य विहार करते हैं।
रसिक मंजरी 12 श्लोकों की संक्षिप्त रचना है जिसकी रचना श्री हरिव्यास देवाचार्य के शिष्य श्री रूप रसिक देवाचार्य ने की है ।
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रसिक-शिरोमणि श्यामसुन्दर और अद्भुत रूप-लावण्य से युक्त गौरवर्णा श्री राधा, श्रीधाम वृन्दावन के गहन कुंजों में युगल रूप से विविध रसपूर्ण लीलाओं में नित्य विहार करते हैं।
नित्य विहार के अपार रस में रंगे, श्री लाड़ली लाल अपने तन और मन की सुधि को भुलाए हुए, उस महारस सिंधु में सदा मगन हैं।
मनोहर देश श्री वृंदावन धाम में नित्य नवीन दूल्हा दुल्हन विराजमान हैं जिनकी बदन ज्योति पर कोटि कोटि चंद्रमाओं को न्यौछावर कर देना चाहिए ।
निकुंजेश्वर श्रीकृष्ण का सर्वस्व श्री राधा हैं और निकुंजेश्वरी श्री राधा का सर्वस्व श्रीकृष्ण। एक-दूसरे के अतिरिक्त उन्हें कुछ भी प्रिय नहीं लगता; एक-दूसरे के संग में ही उनका प्राण और जीवन निहित है।