सरसमंजावली

सरसमंजावली के रचयता हरिदासी परंपरा के आचार्य श्री सहचरिशरण जी हैं । इस ग्रन्थ में 148 माँझ हैं, जिसमें सिद्धांत, ज्ञान, भक्ति, श्रृंगार रस का समावेश है ।

2 लेख उपलब्ध हैं

  1. हर दम याद किया कर हरि की - श्री सहचरीशरण देव, सरसमंजावली (8)

    हे मन, प्रत्येक क्षण तू श्री हरि का स्मरण किया कर, तेरे दुःख को वे हर लेंगे । मेरा कहा असत्य नहीं होगा, आनँदकंद श्री कृष्ण अवश्य तुझपर कृपा करेंगे ।

  2. बाँकी पाग चन्द्रिका तापर तुर्रा रुरकि रहा है - श्री सहचरीशरण देव, सरसमंजावली (29)

    अनंत-अनंत सौंदर्य-माधुर्य-निधि ठाकुर श्रीबांकेबिहारीजी महाराज के सिर पर बंधी टेडी पाग सुशोभित हो रही है। पाग पर चन्द्रिका और तिरछे लगे तुर्रे की शोभा बड़ी ही निराली है।