यही सार को सार है मनबा - श्री जुगल सहचरी
हे मन, सार की यही बात है कि अपने मुख से निरंतर श्री राधा-कृष्ण का नाम जपो या उनका संकीर्तन करो। इसलिए तू श्री वृंदावन में वास कर, रसिक संतों का संग कर और सतगुरु की शरण में रह।
श्री जुगल सहचरी, ब्रज के एक रसिक भक्त हैं।
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हे मन, सार की यही बात है कि अपने मुख से निरंतर श्री राधा-कृष्ण का नाम जपो या उनका संकीर्तन करो। इसलिए तू श्री वृंदावन में वास कर, रसिक संतों का संग कर और सतगुरु की शरण में रह।
अपने मुख-वाणी से श्री राधा का नाम उच्चारण करो। जब श्री राधा अपनी करुणामयी दृष्टि डालती हैं तभी उनके राजधानी श्री धाम वृंदावन का वास मिलता है ।