श्री नरहरि अलि

श्री नरहरि अली 19वीं सदी के ब्रज के रसिक कवि थे । उन्होंने स्वामीशरण जी से दीक्षा प्राप्त की। स्वामीशरण जी मोरकुटी, बरसाना में रहते थे और नरहरि अली भी दीर्घ काल तक मोरकुटी ही रहे । श्री नरहरि अली के पद मुख्य रूप से श्री राधा कृष्ण और स्वामी श्री हरिदासजी की महिमा पर केंद्रित है। उन्होंने अपने अधिकांश पद ब्रजभाषा भाषा में लिखे।

3 लेख उपलब्ध हैं

  1. मैं तू, तू मैं हो गये - श्री नरहरि अलि

    श्री कृष्ण श्री राधा से कहते हैं कि हे राधे - मैं तुम बन गया और तुम मैं हो गई (अर्थात् हम दोनों एक हो गए), मैं तुम्हारा तन और तुम मेरी प्राण, अब कोई नहीं कह सकता कि मैं और तुम भिन्न हैं।

  2. श्यामा प्रबल सहाय हमारी - श्री नरहरि अली

    हमारी सर्वसमर्थ स्वामिनी श्री श्यामा जू [राधा] अति ही सहायक हैं । जिसके डर से ब्रह्मा, इंद्र, शिव आदि भी डरते हैं वो साक्षात डर भी भगवान श्री कृष्ण से डरता है ।