मैं तू, तू मैं हो गये - श्री नरहरि अलि
श्री कृष्ण श्री राधा से कहते हैं कि हे राधे - मैं तुम बन गया और तुम मैं हो गई (अर्थात् हम दोनों एक हो गए), मैं तुम्हारा तन और तुम मेरी प्राण, अब कोई नहीं कह सकता कि मैं और तुम भिन्न हैं।
श्री नरहरि अली 19वीं सदी के ब्रज के रसिक कवि थे । उन्होंने स्वामीशरण जी से दीक्षा प्राप्त की। स्वामीशरण जी मोरकुटी, बरसाना में रहते थे और नरहरि अली भी दीर्घ काल तक मोरकुटी ही रहे । श्री नरहरि अली के पद मुख्य रूप से श्री राधा कृष्ण और स्वामी श्री हरिदासजी की महिमा पर केंद्रित है। उन्होंने अपने अधिकांश पद ब्रजभाषा भाषा में लिखे।
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श्री कृष्ण श्री राधा से कहते हैं कि हे राधे - मैं तुम बन गया और तुम मैं हो गई (अर्थात् हम दोनों एक हो गए), मैं तुम्हारा तन और तुम मेरी प्राण, अब कोई नहीं कह सकता कि मैं और तुम भिन्न हैं।
हे निकुंज विहारिणी, महारानी श्री राधा, आप नित्य ही प्रेम रस में छकी हुई ऐसी अलबेली सरकार हैं जो सुन्दरता की अगाध खान हैं।
हमारी सर्वसमर्थ स्वामिनी श्री श्यामा जू [राधा] अति ही सहायक हैं । जिसके डर से ब्रह्मा, इंद्र, शिव आदि भी डरते हैं वो साक्षात डर भी भगवान श्री कृष्ण से डरता है ।