एक ही सिंगार तन एक प्राँन एक मन - श्री नवल देव जू की वाणी (8)
हे सखी, श्री श्यामाश्याम का श्रृंगार एक है, उनके तन-मन-प्राण भी एक हैं, दोनों का स्वरुप भी एक है, जिसकी कोई समानता नहीं दिखाई पड़ती।
श्री नवलदेव, वृंदावन के एक रसिक संत थे जो श्री हरिदासी संप्रदाय के श्री नागरिदेव जी के शिष्य एवं भी श्री कृष्णदेव के छोटे भाई थे ।
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हे सखी, श्री श्यामाश्याम का श्रृंगार एक है, उनके तन-मन-प्राण भी एक हैं, दोनों का स्वरुप भी एक है, जिसकी कोई समानता नहीं दिखाई पड़ती।
रंगीली श्री राधा श्री लाल जी के ह्रदय में प्रेम के रंग भरती हैं । श्री प्रिया लाल का एक ही तन और मन है एवं दोनों एक समान ही हैं । वे दोनों एक क्षण के लिए भी दूसरे से विलग नहीं होते ।