श्री राधा रस सिद्धांत [निकुंज केली माधुरी]

'श्री राधा रस सिद्धांत' निकुंज केली माधुरी का छब्बीसवां अध्याय है, जिसकी रचना श्री अली माधुरी जी ने की है, जिसमें 10 दोहों में श्री राधा की कृपा प्राप्ति के साधन का वर्णन किया गया है।

4 लेख उपलब्ध हैं

  1. साधन धर्म न भटकना - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुंज केलि माधुरी, श्री राधा रस सिद्धांत (6)

    जीव चाहे जितने भी धर्म-कर्म, व्रत, तप या साधन क्यों न कर ले, उसकी भटकन समाप्त नहीं होती, और न ही वह अंततः लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है । केवल श्री राधारानी की कृपा से ही जीव को परम लक्ष्य की प्राप्ति होती है।

  2. करै कृपा जब लाड़िली, मिटै हिये भ्रम जाल - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुंज केलि माधुरी, श्री राधा रस सिद्धांत (5)

    जब लाड़िली जी (श्री राधा) कृपा करती हैं तब हृदय के समस्त भ्रम-जाल स्वतः ही मिट जाते हैं । वे अपने श्रीचरणों की सेवा प्रदान कर जीव को सहज ही प्रेम-रस में सराबोर कर देती हैं।

  3. शास्त्र शिरोमणि श्याम को - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुंज केलि माधुरी, श्री राधा रस सिद्धांत (2)

    वेदों एवं शास्त्रों में श्री कृष्ण को ही परम तत्व बताया गया है, वही श्री कृष्ण अपने श्री मुख से कहते हैं कि मैं श्री राधा का दास हूँ।

  4. कृपा करैं श्री हरि प्रिया - श्री अली माधुरी, श्री निकुंज केलि माधुरी, श्री राधा रस सिद्धांत (4)

    जब श्री हरिप्रिया श्री राधा कृपा करती हैं, तब वे अपने चरणों का अनुराग-रस प्रदान करती हैं। उसी कृपा से जीव को नित्य-विहार रूपी परम सार का भी सार रस सुलभ हो जाता है।