कीजिय ये दृढ़ चित्त में, तज दारा सुत वित्त - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, वृंदावन अष्टक (26)
मन में दृढ़ता भरकर, पत्नी, बच्चों एवं धन-संपत्ति के मोह का त्याग कर श्री वृन्दावन धाम में नित्य वास करना चाहिए।
श्री वृन्दावन अष्टक श्री लाल बलबीर ने अपनी ग्रंथ ब्रज विनोद में लिखा है जिनमें वृन्दावन का अद्भुत गुणगान है ।
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मन में दृढ़ता भरकर, पत्नी, बच्चों एवं धन-संपत्ति के मोह का त्याग कर श्री वृन्दावन धाम में नित्य वास करना चाहिए।
भगवान शिव, ब्रह्मा जी और उद्धव जैसे परम ज्ञानी एवं भक्त भी जिस वास की निरंतर अभिलाषा करते हैं, वही आशा श्री लाल बलबीर के हृदय में भी है। वे आर्त भाव से पुकारते हैं कि हे लाड़िली-लाल (श्री राधा-कृष्ण)! आप मुझे कब इस परम पावन श्री वृन्दावन धाम में नित्य वास प्रदान करेंगे?
चौदहों लोकों में मुकुट-मणि तथा नित्य ही समस्त प्रकार से अनन्त सुख प्रदान करने वाला श्रीधाम वृन्दावन-चन्द्र, श्री वृषभानु-नन्दिनी श्री राधिका का है।
जिस वृंदावन धाम की रज को साक्षात शिव जी, चतुरानन इत्यादि भी चाहते हैं एवं बड़े ही उत्साह से वृंदावन का गुणगान कर वृंदावन वास की कामना रखते हैं।