अवध उड़ीसा द्वारिका, बद्री अरु केदार।
ए न होहिं हरिदास के, समाईं न नित विहार॥
- श्री बिहारिन देव, बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (237)
नित्य विहार-रूपी दुर्लभ रस, जिसे ललिता अवतार स्वामी श्री हरिदास जी ने बरसाया एवं स्वीकार किया है, उसकी तुलना अवध, उड़ीसा, द्वारिका, बद्रीनाथ, केदारनाथ आदि किसी भी रस से नहीं की जा सकती।
ए न होहिं हरिदास के, समाईं न नित विहार॥
- श्री बिहारिन देव, बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (237)
नित्य विहार-रूपी दुर्लभ रस, जिसे ललिता अवतार स्वामी श्री हरिदास जी ने बरसाया एवं स्वीकार किया है, उसकी तुलना अवध, उड़ीसा, द्वारिका, बद्रीनाथ, केदारनाथ आदि किसी भी रस से नहीं की जा सकती।

