ब्रज के सवैया

ब्रज के सवैया, श्री राधा कृष्ण एवं ब्रज धाम को समर्पित छंदों का संग्रह है जिसे ब्रज के विभिन्न रसिक संतों द्वारा लिखा गया है ।

299 सवैया उपलब्ध हैं

  1. कोउ कहै उद्दिम साधि उपाधि - श्री नागरीदेव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (14)

    कोई कहता है कि कठिन पुरुषार्थ का साधन करके सांसारिक बाधाओं को दूर करो, किंतु उस अत्यंत गंभीर और अगाध प्रेम-मार्ग की बात को कोई केवल अपने बल पर हृदय में कैसे धारण कर सकता है? कोई चतुरता और युक्तियों पर विचार करने की सलाह देता है, तो कोई इस सत्य को नहीं समझ पाता कि काल के वश में होकर यह अमूल्य जीवन और धन व्यर्थ ही बीता जा रहा है।

  2. ब्रज की बलि आजु निकुञ्जन - श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (80)

    आज निकुंजों में ब्रज के प्राण-सर्वस्व असीम सुख की वर्षा कर रहे हैं, जहाँ प्रियतम श्रीकृष्ण अपनी लाड़ली श्रीराधा के आलस्य से युक्त मुखचंद्र को निहारकर परम आनंद प्राप्त कर रहे हैं।

  3. हों सबभांति विगारी प्यारी तुम - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (121)

    हे प्यारी जी! मैं सब प्रकार से बिगड़ा हुआ हूँ, अब आप पतितों का उद्धार करने के अपने विरद (स्वभाव) को संभालिए। मैंने अपने अनेक जन्म अज्ञानता की नींद में सोकर ही गँवा दिए हैं, इसलिए अब आप मुझ पर अपनी कृपादृष्टि डालिए।

  4. तुम बड़भागिनी कानन रानी तो - श्रीहित चाचा वृंदावन दास जी

    हे वृन्दावन की महारानी! आप अत्यंत सौभाग्यशाली हैं, जिनका पावन यश यहाँ के पक्षियों को भी अत्यंत प्रिय लगता है और वे सदैव आपका ही गान करते हैं।

  5. नव भूषण भूषित शक्तिमयी रस - डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’

    नवीन आभूषणों से सुसज्जित, साक्षात् परम शक्तिस्वरूपा, दिव्य रस और रास-क्रीड़ा की स्वामिनी तथा सबको परम आनंद प्रदान करने वाली श्रीराधे हैं।

  6. सब ठाकुर को ठाकुर हरि - श्री बिहारिन देव, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, रस के सवैया (01)

    यह बार सर्वस्व विदित है कि श्रीहरि समस्त ठाकुरों के भी ठाकुर हैं, किन्तु उन सर्वेश्वर श्रीहरि की भी स्वामिनी श्रीराधा हैं। प्राणप्रिय श्रीकृष्ण अपना सारा मान-अभिमान त्यागकर अपनी स्वामिनी श्री राधा से प्रेम की याचना करते रहते हैं और अपना समस्त प्रभुत्व छिपाकर उनके प्रेम के अधीन होकर ही रहते हैं।

  7. यह प्रेम कथा कहिये किहि - श्री ठाकुर जी

    हृदय की इस गम्भीर प्रेम-व्यथा को किसे कहें, क्योंकि यदि किसी से कहें भी तो कोई इसका विश्वास नहीं करता। सब केवल ऊपर-ऊपर से सांत्वना देना चाहते हैं, परन्तु भीतर लगे इस प्रेम-रोग को कोई पहचान नहीं पाता।

  8. जै राधा मन हरनी मोहन - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (293)

    श्री कृष्ण के मन को हरने वाली, श्री राधा रानी की जय हो जिनके चरण-कमल मेरे शीश पर सदा सुशोभित हैं। उन्होंने अपनी कृपा-सुधा का सिंचन करके अपनी इस दासी के सूखे हुए जीवन रूपी धान को पुनः हरा-भरा कर दिया है।

  9. मदिरा रस रूप की पीते हुये - डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’

    प्रियतम श्रीकृष्ण के सौंदर्य-रस रूपी मदिरा का निरंतर पान करते रहने के कारण मेरे ये दोनों नेत्र सदा प्रेम के उन्माद में मग्न और थके से रहते हैं।

  10. लीने लली ललतादिक संग उमंग - श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (61)

    श्री वृषभानु-दुलारी श्रीराधा अपनी ललिता आदि सखियों के संग अत्यंत उमंग के साथ सुंदर फुलवारी में पधारी हैं जहाँ मालती, कुंद, निवारी तथा गुलाब आदि विविध पुष्पों से सुसज्जित फुलवारी चारों ओर अपनी सुगंध बिखेर रही है।

  11. ललिता श्रीहरिदासी के आँगन सुखद - श्री राधाशरण देव

    स्वामी श्रीहरिदास जी (ललिता सखी) के आँगन में अत्यंत सुखदाई बधाई बज रही है, क्योंकि रसिक भक्तों को परमानंद प्रदान करने के लिए निकुंज महल से साक्षात् श्रीबाँकेबिहारी जी प्रकट हो गए हैं।

  12. जप नाम सदा प्रभु वल्लभ को - श्री रूपचंद जी ‘भूप’

    साधक को चाहिए कि वह सदा अपने प्राणप्रिय महाप्रभु श्री वल्लभ का नाम जपता रहे और उन्हीं के परम पावन यश का गान करता रहे। वह पुष्टिमार्ग के अलौकिक भगवद-रस के रंग में पूरी तरह रँग जाए और उनके द्वारा दिखाए गए, इस परम पवित्र मार्ग पर निरंतर चलता रहे।

  13. मन की गति तौं तुम - श्री चंद्र लाल गोस्वामी जी, अभिलाष बत्तीसी

    हे स्वामिनी जी! मेरे हृदय की वास्तविक दशा तो आप भली-भाँति जानती ही हैं; इस शरीर के बल से तो मुझसे कोई तप या आध्यात्मिक साधन सफल नहीं हो सकता। मैं नहीं जानता कि आपके किस अपार कृपा-बल से मुझे रसोपासना के परम आचार्य श्री हरिवंश महाप्रभु का यह पावन मार्ग प्राप्त हुआ है।

  14. वेद थके कहि तत्र थके - श्री सुंदरदास जी

    उस परम तत्व, भगवान (श्री कृष्ण) की महिमा का वर्णन करते-करते वेद थक गए, तत्त्ववेत्ता थक गए और ग्रन्थ भी दिन-रात उसका गुणगान करते-करते थक गए। शेष, शिव और इन्द्र जैसे देवता भी उसकी खोज अनेक प्रकार से करते रहे, परन्तु उसकी पूर्ण सीमा नहीं पा सके।