मंजन चीर सु हार हिये - श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (29)
श्री वृषभानु-नंदिनी श्री राधा स्नान करके सुंदर वस्त्र, हृदय पर मनोहर हार, मस्तक पर तिलक-बिंदी, नेत्रों में कज्जल और नासिका में मोती नथ धारण किए हुए हैं।
ब्रज के सवैया, श्री राधा कृष्ण एवं ब्रज धाम को समर्पित छंदों का संग्रह है जिसे ब्रज के विभिन्न रसिक संतों द्वारा लिखा गया है ।
302 सवैया उपलब्ध हैं
श्री वृषभानु-नंदिनी श्री राधा स्नान करके सुंदर वस्त्र, हृदय पर मनोहर हार, मस्तक पर तिलक-बिंदी, नेत्रों में कज्जल और नासिका में मोती नथ धारण किए हुए हैं।
श्री कृष्ण की आनंद और प्रेम-रस से भरी तिरछी चितवन तथा उनकी अत्यंत सुंदर मुस्कान मन को बहुत सुहावनी लगती है।
मेरे कमल रूपी हाथ श्रीयुगल सरकार के कोमल चरणों और अंगों की सेवा-चांपन करने के लिए सदा वहीं टिके रहें।
कोई कहता है कि कठिन पुरुषार्थ का साधन करके सांसारिक बाधाओं को दूर करो, किंतु उस अत्यंत गंभीर और अगाध प्रेम-मार्ग की बात को कोई केवल अपने बल पर हृदय में कैसे धारण कर सकता है? कोई चतुरता और युक्तियों पर विचार करने की सलाह देता है, तो कोई इस सत्य को नहीं समझ पाता कि काल के वश में होकर यह अमूल्य जीवन और धन व्यर्थ ही बीता जा रहा है।
आज निकुंजों में ब्रज के प्राण-सर्वस्व असीम सुख की वर्षा कर रहे हैं, जहाँ प्रियतम श्रीकृष्ण अपनी लाड़ली श्रीराधा के आलस्य से युक्त मुखचंद्र को निहारकर परम आनंद प्राप्त कर रहे हैं।
मैं सदा प्रभु के इन नयनों पर न्योछावर होता रहूँ और आपकी इस सुंदर छटा पर निरंतर बलिहारी जाता रहूँ।
हे प्यारी जी! मैं सब प्रकार से बिगड़ा हुआ हूँ, अब आप पतितों का उद्धार करने के अपने विरद (स्वभाव) को संभालिए। मैंने अपने अनेक जन्म अज्ञानता की नींद में सोकर ही गँवा दिए हैं, इसलिए अब आप मुझ पर अपनी कृपादृष्टि डालिए।
श्रीकृष्ण का श्याम वर्ण अत्यंत मनमोहक है, उनके नेत्र सलोने और चित्ताकर्षक हैं तथा उनके मुखमंडल पर घुंघराली अलकें बलखा रही हैं।
हे वृन्दावन की महारानी! आप अत्यंत सौभाग्यशाली हैं, जिनका पावन यश यहाँ के पक्षियों को भी अत्यंत प्रिय लगता है और वे सदैव आपका ही गान करते हैं।
नवीन आभूषणों से सुसज्जित, साक्षात् परम शक्तिस्वरूपा, दिव्य रस और रास-क्रीड़ा की स्वामिनी तथा सबको परम आनंद प्रदान करने वाली श्रीराधे हैं।
ब्रजमंडल में साक्षात् परम निज धाम प्रकट हुआ है, जहाँ समस्त देवता और असुर भी इस पावन भूमि का आश्रय लेने के लिए शरीर धारण करके निवास कर रहे हैं।
श्री राधिका रानी के गले में हीरों के मनमोहक हार सुशोभित हैं, तथा वे गजमुक्ताओं (श्रेष्ठ मोतियों) के अत्यंत सुखदायक गजरे धारण किए हुए हैं।
यह बार सर्वस्व विदित है कि श्रीहरि समस्त ठाकुरों के भी ठाकुर हैं, किन्तु उन सर्वेश्वर श्रीहरि की भी स्वामिनी श्रीराधा हैं। प्राणप्रिय श्रीकृष्ण अपना सारा मान-अभिमान त्यागकर अपनी स्वामिनी श्री राधा से प्रेम की याचना करते रहते हैं और अपना समस्त प्रभुत्व छिपाकर उनके प्रेम के अधीन होकर ही रहते हैं।
हृदय की इस गम्भीर प्रेम-व्यथा को किसे कहें, क्योंकि यदि किसी से कहें भी तो कोई इसका विश्वास नहीं करता। सब केवल ऊपर-ऊपर से सांत्वना देना चाहते हैं, परन्तु भीतर लगे इस प्रेम-रोग को कोई पहचान नहीं पाता।
श्री कृष्ण के मन को हरने वाली, श्री राधा रानी की जय हो जिनके चरण-कमल मेरे शीश पर सदा सुशोभित हैं। उन्होंने अपनी कृपा-सुधा का सिंचन करके अपनी इस दासी के सूखे हुए जीवन रूपी धान को पुनः हरा-भरा कर दिया है।
प्रियतम श्रीकृष्ण के सौंदर्य-रस रूपी मदिरा का निरंतर पान करते रहने के कारण मेरे ये दोनों नेत्र सदा प्रेम के उन्माद में मग्न और थके से रहते हैं।
जिन भगवान के गुणों का गान गन्धर्व, सरस्वती और शेषजी निरन्तर करते हैं, जिनकी महिमा का यथार्थ वर्णन कोई नहीं कर सकता।
श्री वृषभानु-दुलारी श्रीराधा अपनी ललिता आदि सखियों के संग अत्यंत उमंग के साथ सुंदर फुलवारी में पधारी हैं जहाँ मालती, कुंद, निवारी तथा गुलाब आदि विविध पुष्पों से सुसज्जित फुलवारी चारों ओर अपनी सुगंध बिखेर रही है।
स्वामी श्रीहरिदास जी (ललिता सखी) के आँगन में अत्यंत सुखदाई बधाई बज रही है, क्योंकि रसिक भक्तों को परमानंद प्रदान करने के लिए निकुंज महल से साक्षात् श्रीबाँकेबिहारी जी प्रकट हो गए हैं।
साधक को चाहिए कि वह सदा अपने प्राणप्रिय महाप्रभु श्री वल्लभ का नाम जपता रहे और उन्हीं के परम पावन यश का गान करता रहे। वह पुष्टिमार्ग के अलौकिक भगवद-रस के रंग में पूरी तरह रँग जाए और उनके द्वारा दिखाए गए, इस परम पवित्र मार्ग पर निरंतर चलता रहे।