यह प्रेम कथा कहिये किहि - श्री ठाकुर जी
हृदय की इस गम्भीर प्रेम-व्यथा को किसे कहें, क्योंकि यदि किसी से कहें भी तो कोई इसका विश्वास नहीं करता। सब केवल ऊपर-ऊपर से सांत्वना देना चाहते हैं, परन्तु भीतर लगे इस प्रेम-रोग को कोई पहचान नहीं पाता।
ब्रज के सवैया, श्री राधा कृष्ण एवं ब्रज धाम को समर्पित छंदों का संग्रह है जिसे ब्रज के विभिन्न रसिक संतों द्वारा लिखा गया है ।
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हृदय की इस गम्भीर प्रेम-व्यथा को किसे कहें, क्योंकि यदि किसी से कहें भी तो कोई इसका विश्वास नहीं करता। सब केवल ऊपर-ऊपर से सांत्वना देना चाहते हैं, परन्तु भीतर लगे इस प्रेम-रोग को कोई पहचान नहीं पाता।
प्रियतम श्रीकृष्ण के सौंदर्य-रस रूपी मदिरा का निरंतर पान करते रहने के कारण मेरे ये दोनों नेत्र सदा प्रेम के उन्माद में मग्न और थके से रहते हैं।
जिन भगवान के गुणों का गान गन्धर्व, सरस्वती और शेषजी निरन्तर करते हैं, जिनकी महिमा का यथार्थ वर्णन कोई नहीं कर सकता।
श्री वृषभानु-दुलारी श्रीराधा अपनी ललिता आदि सखियों के संग अत्यंत उमंग के साथ सुंदर फुलवारी में पधारी हैं जहाँ मालती, कुंद, निवारी तथा गुलाब आदि विविध पुष्पों से सुसज्जित फुलवारी चारों ओर अपनी सुगंध बिखेर रही है।
स्वामी श्रीहरिदास जी (ललिता सखी) के आँगन में अत्यंत सुखदाई बधाई बज रही है, क्योंकि रसिक भक्तों को परमानंद प्रदान करने के लिए निकुंज महल से साक्षात् श्रीबाँकेबिहारी जी प्रकट हो गए हैं।
साधक को चाहिए कि वह सदा अपने प्राणप्रिय महाप्रभु श्री वल्लभ का नाम जपता रहे और उन्हीं के परम पावन यश का गान करता रहे। वह पुष्टिमार्ग के अलौकिक भगवद-रस के रंग में पूरी तरह रँग जाए और उनके द्वारा दिखाए गए, इस परम पवित्र मार्ग पर निरंतर चलता रहे।
शेष, शिव, सूर्य, गणेश तथा स्वयं वेद भी विचार करते-करते उस परम तत्त्व की पूर्ण सीमा नहीं पा सके।
हे स्वामिनी जी! मेरे हृदय की वास्तविक दशा तो आप भली-भाँति जानती ही हैं; इस शरीर के बल से तो मुझसे कोई तप या आध्यात्मिक साधन सफल नहीं हो सकता। मैं नहीं जानता कि आपके किस अपार कृपा-बल से मुझे रसोपासना के परम आचार्य श्री हरिवंश महाप्रभु का यह पावन मार्ग प्राप्त हुआ है।
उस परम तत्व, भगवान (श्री कृष्ण) की महिमा का वर्णन करते-करते वेद थक गए, तत्त्ववेत्ता थक गए और ग्रन्थ भी दिन-रात उसका गुणगान करते-करते थक गए। शेष, शिव और इन्द्र जैसे देवता भी उसकी खोज अनेक प्रकार से करते रहे, परन्तु उसकी पूर्ण सीमा नहीं पा सके।
हे सखी! क्या तूने आज प्रिया-प्रियतम के उस अनूठे और कौतुकभरे विलास को देखा? मेरी बुद्धि इतनी सामर्थ्यवान नहीं कि मैं उसका पूरी तरह से बखान कर सकूँ। आज हमारी प्यारी श्री राधा जी के शीश पर मोरपंख सुशोभित है, और उनके हाथों में वंशी तथा लकुटी (लाठी) है, एवं उनकी कमर में पीताम्बर की डोरी बंधी हुई है (अर्थात् श्री राधा ने श्री कृष्ण का भेष धारण किया है)।
हे सखी! मोहन की वह अत्यंत प्यारी दिव्य चितवन (दृष्टि) का प्रभाव मुझसे शब्दों में कहा नहीं जाता। उनकी वह चितवन मेरे हृदय के भीतर इस प्रकार गहरे धँस गई है कि अब मेरे बार-बार निकालने का प्रयास करने पर भी वह बाहर नहीं निकलती।
यह दिव्य कानन (श्री वृन्दावन अथवा बरसाना धाम) ही मेरी एकमात्र गति (आश्रय) है, यही मेरा स्वामी (पति) है, और यही मेरी माता, पिता तथा भाई है। मैं इस पावन कानन में नित्य निर्भय होकर वास करूँ, और मेरा यह मन इस कानन को त्यागकर कभी भी किसी अन्य स्थान पर न भटके।
हे सखा! मेरे हृदय में आपके मिलन की बड़े ज़ोर की प्यास जगी है, आप शीघ्र आकर मुझे अपने अधरों का दिव्य अमृत (अधरामृत) पिलाकर तृप्त कर दीजिए।
एक सखी श्री राधा से परिहास अथवा मनुहार करते हुए कहती है— हे सखी! तुम यह भली-भांति जानती हो कि गोपाल (श्री कृष्ण) के अंग कमल के समान अत्यंत कोमल हैं। मैं तुम्हारे बलैया लेती हूँ, तुम इतना नहीं पहचानती कि तुम्हारी केवल तनिक सी बेरुखी (मान) से श्री कृष्ण मुरझा जाते हैं?
हे भाई! यह सर्वथा अकाट्य सिद्धांत है कि इहलोक-परलोक दोनों में ही प्रेम के बिना कोई नाता नहीं हुआ करता। इस संसार में माता, पिता, पुत्र और भ्राता आदि के जितने भी नाते हैं, वे मूलतः स्वार्थ की नींव पर टिके हैं। यहाँ वास्तविक निस्वार्थ प्रेम की सुगंध तक नहीं है, इसलिए केवल अज्ञानी लोग ही इन संबंधों में उलझते हैं।
बैठना, उठना और सम्भाषण—सब कुछ उस ब्रह्म का ही रूप है। जाग्रत अवस्था हो या निद्रा, अथवा जगत में जो कुछ भी दृष्टिगोचर होता है, उन समस्त प्रपंचों में केवल उस एक ही परमात्म-तत्व का दर्शन करना ही वास्तविक सम्यक-दृष्टि है।
हे ललिते! आपकी कृपा से यह भाग्य उदित हो गया—हमारी आँखों के सम्मुख एक अति लावण्यमयी युगल-छवि प्रकट हुई है।
हे श्री राधिके! आप व्यर्थ ही इतना हठ क्यों कर रही हैं? थोड़ा अपने प्रियतम के इन सुंदर वचनों को सुनिए, जो अमृत के समान मधुर हैं।
श्री श्यामसुन्दर अपनी प्रिया जी (श्री राधा) के चरण-कमलों में बड़े अनुराग के साथ लाल महावर (जावक) लगा रहे हैं।
हे नवल-नागरी श्री वृषभानु किशोरी (श्री राधा)! मेरी विनती सुनिए और मुझ दीन की सुधि लीजिए।