ब्रज के सवैया

ब्रज के सवैया, श्री राधा कृष्ण एवं ब्रज धाम को समर्पित छंदों का संग्रह है जिसे ब्रज के विभिन्न रसिक संतों द्वारा लिखा गया है ।

284 सवैया उपलब्ध हैं

  1. यह प्रेम कथा कहिये किहि - श्री ठाकुर जी

    हृदय की इस गम्भीर प्रेम-व्यथा को किसे कहें, क्योंकि यदि किसी से कहें भी तो कोई इसका विश्वास नहीं करता। सब केवल ऊपर-ऊपर से सांत्वना देना चाहते हैं, परन्तु भीतर लगे इस प्रेम-रोग को कोई पहचान नहीं पाता।

  2. मदिरा रस रूप की पीते - डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’

    प्रियतम श्रीकृष्ण के सौंदर्य-रस रूपी मदिरा का निरंतर पान करते रहने के कारण मेरे ये दोनों नेत्र सदा प्रेम के उन्माद में मग्न और थके से रहते हैं।

  3. लीने लली ललतादिक संग उमंग - श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (61)

    श्री वृषभानु-दुलारी श्रीराधा अपनी ललिता आदि सखियों के संग अत्यंत उमंग के साथ सुंदर फुलवारी में पधारी हैं जहाँ मालती, कुंद, निवारी तथा गुलाब आदि विविध पुष्पों से सुसज्जित फुलवारी चारों ओर अपनी सुगंध बिखेर रही है।

  4. ललिता श्रीहरिदासी के आँगन सुखद - श्री राधाशरण देव

    स्वामी श्रीहरिदास जी (ललिता सखी) के आँगन में अत्यंत सुखदाई बधाई बज रही है, क्योंकि रसिक भक्तों को परमानंद प्रदान करने के लिए निकुंज महल से साक्षात् श्रीबाँकेबिहारी जी प्रकट हो गए हैं।

  5. जप नाम सदा प्रभु वल्लभ को - श्री रूपचंद जी ‘भूप’

    साधक को चाहिए कि वह सदा अपने प्राणप्रिय महाप्रभु श्री वल्लभ का नाम जपता रहे और उन्हीं के परम पावन यश का गान करता रहे। वह पुष्टिमार्ग के अलौकिक भगवद-रस के रंग में पूरी तरह रँग जाए और उनके द्वारा दिखाए गए, इस परम पवित्र मार्ग पर निरंतर चलता रहे।

  6. मन की गति तौं तुम - श्री चंद्र लाल गोस्वामी जी, अभिलाष बत्तीसी

    हे स्वामिनी जी! मेरे हृदय की वास्तविक दशा तो आप भली-भाँति जानती ही हैं; इस शरीर के बल से तो मुझसे कोई तप या आध्यात्मिक साधन सफल नहीं हो सकता। मैं नहीं जानता कि आपके किस अपार कृपा-बल से मुझे रसोपासना के परम आचार्य श्री हरिवंश महाप्रभु का यह पावन मार्ग प्राप्त हुआ है।

  7. वेद थके कहि तत्र थके - श्री सुंदरदास जी

    उस परम तत्व, भगवान (श्री कृष्ण) की महिमा का वर्णन करते-करते वेद थक गए, तत्त्ववेत्ता थक गए और ग्रन्थ भी दिन-रात उसका गुणगान करते-करते थक गए। शेष, शिव और इन्द्र जैसे देवता भी उसकी खोज अनेक प्रकार से करते रहे, परन्तु उसकी पूर्ण सीमा नहीं पा सके।

  8. हेलीरी तैं लखे आजु के ख्याल - श्री हठी जी, राधा सुधा शतक (34)

    हे सखी! क्या तूने आज प्रिया-प्रियतम के उस अनूठे और कौतुकभरे विलास को देखा? मेरी बुद्धि इतनी सामर्थ्यवान नहीं कि मैं उसका पूरी तरह से बखान कर सकूँ। आज हमारी प्यारी श्री राधा जी के शीश पर मोरपंख सुशोभित है, और उनके हाथों में वंशी तथा लकुटी (लाठी) है, एवं उनकी कमर में पीताम्बर की डोरी बंधी हुई है (अर्थात् श्री राधा ने श्री कृष्ण का भेष धारण किया है)।

  9. मोहन मोपै कही न जाई - श्री दयाबाई

    हे सखी! मोहन की वह अत्यंत प्यारी दिव्य चितवन (दृष्टि) का प्रभाव मुझसे शब्दों में कहा नहीं जाता। उनकी वह चितवन मेरे हृदय के भीतर इस प्रकार गहरे धँस गई है कि अब मेरे बार-बार निकालने का प्रयास करने पर भी वह बाहर नहीं निकलती।

  10. कानन मो गति कानन मो पति - श्री वृंदावन दास जी

    यह दिव्य कानन (श्री वृन्दावन अथवा बरसाना धाम) ही मेरी एकमात्र गति (आश्रय) है, यही मेरा स्वामी (पति) है, और यही मेरी माता, पिता तथा भाई है। मैं इस पावन कानन में नित्य निर्भय होकर वास करूँ, और मेरा यह मन इस कानन को त्यागकर कभी भी किसी अन्य स्थान पर न भटके।

  11. बड़े जोर की प्यास लगी उर में - डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’

    हे सखा! मेरे हृदय में आपके मिलन की बड़े ज़ोर की प्यास जगी है, आप शीघ्र आकर मुझे अपने अधरों का दिव्य अमृत (अधरामृत) पिलाकर तृप्त कर दीजिए।

  12. वह कंज सो कोमल - श्री ठाकुर जी

    एक सखी श्री राधा से परिहास अथवा मनुहार करते हुए कहती है— हे सखी! तुम यह भली-भांति जानती हो कि गोपाल (श्री कृष्ण) के अंग कमल के समान अत्यंत कोमल हैं। मैं तुम्हारे बलैया लेती हूँ, तुम इतना नहीं पहचानती कि तुम्हारी केवल तनिक सी बेरुखी (मान) से श्री कृष्ण मुरझा जाते हैं?

  13. पिता सुत बंधु कहा सम्बंध - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के कवित्त-सवैया (35)

    हे भाई! यह सर्वथा अकाट्य सिद्धांत है कि इहलोक-परलोक दोनों में ही प्रेम के बिना कोई नाता नहीं हुआ करता। इस संसार में माता, पिता, पुत्र और भ्राता आदि के जितने भी नाते हैं, वे मूलतः स्वार्थ की नींव पर टिके हैं। यहाँ वास्तविक निस्वार्थ प्रेम की सुगंध तक नहीं है, इसलिए केवल अज्ञानी लोग ही इन संबंधों में उलझते हैं।

  14. बैठत केवल उठत केवल - श्री सुंदरदास जी

    बैठना, उठना और सम्भाषण—सब कुछ उस ब्रह्म का ही रूप है। जाग्रत अवस्था हो या निद्रा, अथवा जगत में जो कुछ भी दृष्टिगोचर होता है, उन समस्त प्रपंचों में केवल उस एक ही परमात्म-तत्व का दर्शन करना ही वास्तविक सम्यक-दृष्टि है।