ब्रज के लोकगीत

ब्रज के लोकगीत जन समुदाय में प्रचलित परंपरागत एवं नवीन ब्रज के भक्तों द्वारा लिखे गीतों का संकलन है।

47 लोकगीत उपलब्ध हैं

  1. मृगनैनी नार नवल रसिया जाके - श्री पुरुषोत्तम जी

    मृग के समान सुंदर नेत्रों वाली किशोरीजी (श्री राधा) अपने नवल रसिया (श्री कृष्ण) के संग सुशोभित हैं। उनके बड़े-बड़े नेत्रों में लगा हुआ काजल और उनकी वह तिरछी चितवन मेरे मन में बस गई है।

  2. जय जय जमुना सब सुखकारी - श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (141)

    सब प्रकार के सुखों को प्रदान करने वाली श्री यमुना जी की बारंबार जय हो, जय हो। आप भक्तों पर अत्यंत कृपा करने वाली और साक्षात् करुणा की मूर्ति हैं। आप सदा सबका मंगल (कल्याण) करने वाली और समस्त अमंगलों (दुखों व संकटों) को हरने वाली हैं।

  3. मन लागो जी स्यामाँ स्याम विलासी सों - श्री चन्द्रसखी जी

    मेरा मन उन परम विलासी श्री स्यामा-श्याम (राधा-कृष्ण) में पूर्ण रूप से अनुरक्त हो गया है। रात्रि बीत चुकी है और प्रातःकाल हो गया है, तथा सूर्य की किरणों का प्रकाश सब ओर फैल गया है।

  4. किशोरी मैं तो भली बुरी सो तेरी - श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (16)

    हे किशोरी श्री राधे! मैं जैसी भी हूँ, भली या बुरी, केवल आपकी ही हूँ। मैं विरह की अग्नि में दिन-रात व्याकुल रहती हूँ, कृपा करके मेरी यह पुकार जल्दी सुन लीजिए।

  5. प्यारी को श्रृंगार करत नंदलाला - श्री पुरुषोत्तम जी

    नन्दलाल (श्री कृष्ण) स्वयं अपनी प्रियतमा श्री राधा का श्रृंगार कर रहे हैं। वे बार-बार अपने हाथों से मोतियों की माला पिरो रहे हैं और उनके कानों में आभूषण अथवा लटों को सँवार रहे हैं।

  6. दरसन दै मोरमुकुट वारे - श्री पुरुषोत्तम जी

    हे मोरमुकुट से शोभायमान श्री कृष्ण! कृपा करके मुझे अपने दर्शन प्रदान कीजिए। आपकी कमर पर बँधी सुंदर काछनी अत्यंत मनोहर प्रतीत होती है और आपके पीतवर्ण वस्त्र मंद पवन में लहराकर अद्भुत शोभा बिखेर रहे हैं।

  7. दोऊ मगन भये रस होरी में - श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (172)

    श्री प्रिया-प्रियतम (राधा-कृष्ण) दोनों ही होली के दिव्य रस में पूरी तरह मग्न हैं। लाल (कृष्ण) और लाड़ैती (राधा) एक-दूसरे के गले में बाँहें डाले हुए हैं और प्रेम की अटूट डोरी में बंधे हुए हैं।

  8. दरसन दै निकसि अटा में ते - श्री पुरुषोत्तम जी

    जब श्री राधिका अटारी से पधारकर अपने दर्शन प्रदान करती हैं और अपने मुखारविंद से काले केशों को धीरे से हटाती हैं, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो बादलों की ओट से पूर्ण चंद्रमा का उदय हो रहा हो। [1]

  9. ब्रज की तोय लाज मुकुट वारे - श्री पुरुषोत्तम जी

    हे गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण! ब्रज की लाज और प्रतिष्ठा तुम्हारे ही करकमलों में है।चंद्रमा और सूर्य भी तुम्हारे ही ध्यान में निमग्न रहते हैं, और आकाश के नौ लाख तारे भी निरंतर तुम्हारे ही सौंदर्य को निहारते हैं।

  10. सबसौ सुन्दर है बरसानों व्रज में - ब्रज के लोकगीत

    व्रजधाम में सबसे सुंदर बरसाना धाम है क्योंकि वहाँ साक्षात श्रीराधारानी विराजती हैं। जहाँ स्वयं श्रीकृष्ण भी उनकी अगवानी करते हैं और जिसकी महिमा वेदों द्वारा भी पूर्ण रूप से वर्णित नहीं हो पाती। उसी बरसाने में, ब्रह्माचल पर्वत के शिखर पर स्थित श्री राधा रानी का भव्य मंदिर अनुपम शोभा बिखेरता है।

  11. सुन बरसाने वारी गुलाम तेरो बनवारी - ब्रज के लोकगीत

    हे बरसानेवाली श्री राधा, सुनिए — बनवारी श्री कृष्ण तो आपके ग़ुलाम हैं। आपकी पायल की रुनझुन पर श्री मुरारी वंशी बजाते हैं और उसी ताल पर नृत्य करते हैं।

  12. रस लै तो द्वार पर्‌यो रहियो - श्री पुरुषोत्तम जी

    यदि तुम्हें वास्तविक रस का पान करना है तो किशोरीजी के द्वार पर ही अडिग पड़े रहना । यदि तुम सच्चे रसिक हो, तो समस्त कठिनाइयों और कष्टों को धैर्यपूर्वक सहन करो, क्योंकि इसका फल (रस) अतुलनीय है।

  13. मैं तो गोवर्धन को जाऊँ मेरी वीर - श्री चन्द्रसखी जी

    हे सखी, मैं गोवर्धन जाऊँगी, क्योंकि मेरा चंचल हृदय और कहीं शांति नहीं पाता। मैं प्रेमपूर्वक प्रचुर मात्रा में भोजन बनाकर भोग लगाऊँगी, संतों को आमंत्रित कर उन्हें प्रेम से पवाऊँगी, क्योंकि इसके बिना मेरा हृदय मानता नहीं।