जो रस बरस रह्यो बरसाने - ब्रज के लोक गीत
बरसाने में जो मधुर प्रेम-रस बरस रहा है, वैसा रस तीनों लोकों में कहीं नहीं है। इतना ही नहीं, वह रस तो स्वयं वैकुण्ठ में भी दुर्लभ है।
ब्रज के लोकगीत जन समुदाय में प्रचलित परंपरागत एवं नवीन ब्रज के भक्तों द्वारा लिखे गीतों का संकलन है।
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बरसाने में जो मधुर प्रेम-रस बरस रहा है, वैसा रस तीनों लोकों में कहीं नहीं है। इतना ही नहीं, वह रस तो स्वयं वैकुण्ठ में भी दुर्लभ है।
मृग के समान सुंदर नेत्रों वाली किशोरीजी (श्री राधा) अपने नवल रसिया (श्री कृष्ण) के संग सुशोभित हैं। उनके बड़े-बड़े नेत्रों में लगा हुआ काजल और उनकी वह तिरछी चितवन मेरे मन में बस गई है।
सब प्रकार के सुखों को प्रदान करने वाली श्री यमुना जी की बारंबार जय हो, जय हो। आप भक्तों पर अत्यंत कृपा करने वाली और साक्षात् करुणा की मूर्ति हैं। आप सदा सबका मंगल (कल्याण) करने वाली और समस्त अमंगलों (दुखों व संकटों) को हरने वाली हैं।
मेरा मन उन परम विलासी श्री स्यामा-श्याम (राधा-कृष्ण) में पूर्ण रूप से अनुरक्त हो गया है। रात्रि बीत चुकी है और प्रातःकाल हो गया है, तथा सूर्य की किरणों का प्रकाश सब ओर फैल गया है।
हे किशोरी श्री राधे! मैं जैसी भी हूँ, भली या बुरी, केवल आपकी ही हूँ। मैं विरह की अग्नि में दिन-रात व्याकुल रहती हूँ, कृपा करके मेरी यह पुकार जल्दी सुन लीजिए।
नन्दलाल (श्री कृष्ण) स्वयं अपनी प्रियतमा श्री राधा का श्रृंगार कर रहे हैं। वे बार-बार अपने हाथों से मोतियों की माला पिरो रहे हैं और उनके कानों में आभूषण अथवा लटों को सँवार रहे हैं।
हे मोरमुकुट से शोभायमान श्री कृष्ण! कृपा करके मुझे अपने दर्शन प्रदान कीजिए। आपकी कमर पर बँधी सुंदर काछनी अत्यंत मनोहर प्रतीत होती है और आपके पीतवर्ण वस्त्र मंद पवन में लहराकर अद्भुत शोभा बिखेर रहे हैं।
श्री प्रिया-प्रियतम (राधा-कृष्ण) दोनों ही होली के दिव्य रस में पूरी तरह मग्न हैं। लाल (कृष्ण) और लाड़ैती (राधा) एक-दूसरे के गले में बाँहें डाले हुए हैं और प्रेम की अटूट डोरी में बंधे हुए हैं।
हे श्याम! थोड़ा पास आओ, मैं तुम पर रंग डालूँ। तुम्हारे मुख पर अबीर-गुलाल मलूँ और गालों पर प्रेम से गुलचा लगा दूँ।
जब श्री राधिका अटारी से पधारकर अपने दर्शन प्रदान करती हैं और अपने मुखारविंद से काले केशों को धीरे से हटाती हैं, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो बादलों की ओट से पूर्ण चंद्रमा का उदय हो रहा हो। [1]
हे गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण! ब्रज की लाज और प्रतिष्ठा तुम्हारे ही करकमलों में है।चंद्रमा और सूर्य भी तुम्हारे ही ध्यान में निमग्न रहते हैं, और आकाश के नौ लाख तारे भी निरंतर तुम्हारे ही सौंदर्य को निहारते हैं।
व्रजधाम में सबसे सुंदर बरसाना धाम है क्योंकि वहाँ साक्षात श्रीराधारानी विराजती हैं। जहाँ स्वयं श्रीकृष्ण भी उनकी अगवानी करते हैं और जिसकी महिमा वेदों द्वारा भी पूर्ण रूप से वर्णित नहीं हो पाती। उसी बरसाने में, ब्रह्माचल पर्वत के शिखर पर स्थित श्री राधा रानी का भव्य मंदिर अनुपम शोभा बिखेरता है।
हे बरसानेवाली श्री राधा, सुनिए — बनवारी श्री कृष्ण तो आपके ग़ुलाम हैं। आपकी पायल की रुनझुन पर श्री मुरारी वंशी बजाते हैं और उसी ताल पर नृत्य करते हैं।
यदि तुम्हें वास्तविक रस का पान करना है तो किशोरीजी के द्वार पर ही अडिग पड़े रहना । यदि तुम सच्चे रसिक हो, तो समस्त कठिनाइयों और कष्टों को धैर्यपूर्वक सहन करो, क्योंकि इसका फल (रस) अतुलनीय है।
एक गोपी प्रेमपूर्वक कहती है— हे श्यामसुंदर! थोड़ा और आगे आओ, मैं तुम्हें रंग लगाऊँ, तुम्हारे मस्तक और कपोलों पर गुलाल लगा दूँ।
हे सखी, मैं गोवर्धन जाऊँगी, क्योंकि मेरा चंचल हृदय और कहीं शांति नहीं पाता। मैं प्रेमपूर्वक प्रचुर मात्रा में भोजन बनाकर भोग लगाऊँगी, संतों को आमंत्रित कर उन्हें प्रेम से पवाऊँगी, क्योंकि इसके बिना मेरा हृदय मानता नहीं।
मैंने निरंतर श्री राधा नाम की रटना लगायी है । मेरी पलकों में एवं अलकों में श्री राधा है, मैंने अपनी माँग श्री राधा नाम से भर ली है।
आज मैंने श्री राधारमण जी की सुन्दर छवि देखि, जिनके शीश पर मोर-मुकुट सुशोभित है एवं कानों में कुण्डल शोभित है जिसकी छवि न्यारी है।
अरे कृष्ण, तुमने मेरी आँखों में पिचकारी मार दी, मुझे गाली भी दी, मुझसे अब होली खेली नहीं जाती।
हे सखी, बड़े भाग्य से फागुन का यह उत्सव आया है, मैं जाकर श्याम के संग होली खेलूंगी।