विहारिणि तुमरोही विस्तार।
रहत विहारी रुखै निहारी, रचना रचत अपार॥ [1]
नानाविधि के खेल करत हैं, तुमरे मन अनुहार।
अलीमाधुरी कहँलौं वरणों, महिमा पर बलिहार॥ [2]
- श्री अली माधुरी जी, श्री निकुञ्ज केली माधुरी
हे श्री विहारिणी जी (श्री राधा)! यह संपूर्ण लीला-विलास आपका ही विस्तार है। रसिक-शिरोमणि श्री बिहारी जी सर्वदा आपकी भृकुटि के संकेत की ओर निहारते रहते हैं और आपकी आज्ञा के अनुसार ही नित्य-नवीन लीलाओं की रचना करते रहते हैं। [1]
वे आपकी रुचि और मनोभाव के अनुसार नाना प्रकार के प्रेममय खेल और विहार करते हैं। श्री अली माधुरी कहते हैं, आपकी इस अनन्त महिमा का मैं कहाँ तक वर्णन करूँ? मैं तो आपकी इस अद्भुत महिमा पर सर्वस्व न्योछावर करता हूँ। [2]
रहत विहारी रुखै निहारी, रचना रचत अपार॥ [1]
नानाविधि के खेल करत हैं, तुमरे मन अनुहार।
अलीमाधुरी कहँलौं वरणों, महिमा पर बलिहार॥ [2]
- श्री अली माधुरी जी, श्री निकुञ्ज केली माधुरी
हे श्री विहारिणी जी (श्री राधा)! यह संपूर्ण लीला-विलास आपका ही विस्तार है। रसिक-शिरोमणि श्री बिहारी जी सर्वदा आपकी भृकुटि के संकेत की ओर निहारते रहते हैं और आपकी आज्ञा के अनुसार ही नित्य-नवीन लीलाओं की रचना करते रहते हैं। [1]
वे आपकी रुचि और मनोभाव के अनुसार नाना प्रकार के प्रेममय खेल और विहार करते हैं। श्री अली माधुरी कहते हैं, आपकी इस अनन्त महिमा का मैं कहाँ तक वर्णन करूँ? मैं तो आपकी इस अद्भुत महिमा पर सर्वस्व न्योछावर करता हूँ। [2]

