साकत बाँभन जिन मिलौ वैष्णव - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, साखी (128)

साकत बाँभन जिन मिलौ वैष्णव - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, साखी (128)

साकत बाँभन जिन मिलौ, वैष्णव मिलु चंडाल।
जाहि मिलै सुख पाइयै, मनौं मिले गोपाल॥

- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, साखी (128)

यदि कोई ब्राह्मण भी प्रभु से विमुख और विषयी हो, तो उसका संग कभी नहीं करना चाहिए। उससे तो हरि-भक्त चांडाल का संग भी श्रेष्ठ है, क्योंकि ऐसे भक्त के मिलने से हृदय में परम सुख और आनंद मिलता है, मानो स्वयं श्री गोपाल ही मिल गए हों।