(सवैया)
ब्रज की बलि आजु निकुञ्जन मैं, सुखपुञ्जन कौं बरसाबत है।
तिय को भरो आलस सों मुखचन्द, निहार घनो सुख पाबत है॥ [1]
इक बात मते की कहाँ सुन तूँ, जु सुने हिय में हँसी आवत है।
करि केलि थकी लखि प्रान पिया, पग चांपत प्यारी सुवावत है॥ [2]
- श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (80)
आज ब्रज की निकुंजों में मैं बलिहारी जाऊं, जहाँ रस का अपार समूह बरस रहा है, जहाँ प्रियतम श्रीकृष्ण अपनी लाड़ली श्रीराधा के आलस्य से युक्त मुखचंद्र को निहारकर परम आनंद प्राप्त कर रहे हैं। [1]
हे सखी! सुन, एक बड़े रहस्य व कौतुक की बात कहती हूँ जिसे सुनकर हृदय में हँसी आ जाती है— केलि-क्रीड़ा करके थकी हुई अपनी प्राणप्यारी श्री राधा को देखकर प्रियतम स्वयं उनके चरण दबाते हुए उन्हें सुखपूर्वक पौढ़ा रहे हैं। [2]
ब्रज की बलि आजु निकुञ्जन मैं, सुखपुञ्जन कौं बरसाबत है।
तिय को भरो आलस सों मुखचन्द, निहार घनो सुख पाबत है॥ [1]
इक बात मते की कहाँ सुन तूँ, जु सुने हिय में हँसी आवत है।
करि केलि थकी लखि प्रान पिया, पग चांपत प्यारी सुवावत है॥ [2]
- श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (80)
आज ब्रज की निकुंजों में मैं बलिहारी जाऊं, जहाँ रस का अपार समूह बरस रहा है, जहाँ प्रियतम श्रीकृष्ण अपनी लाड़ली श्रीराधा के आलस्य से युक्त मुखचंद्र को निहारकर परम आनंद प्राप्त कर रहे हैं। [1]
हे सखी! सुन, एक बड़े रहस्य व कौतुक की बात कहती हूँ जिसे सुनकर हृदय में हँसी आ जाती है— केलि-क्रीड़ा करके थकी हुई अपनी प्राणप्यारी श्री राधा को देखकर प्रियतम स्वयं उनके चरण दबाते हुए उन्हें सुखपूर्वक पौढ़ा रहे हैं। [2]

