(सवैया)
कोउ कहै उद्दिम साधि उपाधि, अगाध सु बात कैसे उर आनैं।
कोउ कहै व्याज विचार करो तुम, कोउ धन कालहिं जात न जानैं॥ [1]
अपनी अपनी सब साँच कहैं, न लहैं नट नागर नेह निधानैं।
श्रीनागरीदासि के नाथ के हाथ, ए बादि बकैं बकवादि अयानैं॥ [2]
- श्री नागरीदेव जी, श्री नागरीदेव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (14)
कोई कहता है कि वेदोक्त विधि-विधान के अनुसार साधन-उद्यम करने से ही नित्य-विहार की प्राप्ति होती है, किन्तु इन साधनों में अनेक प्रकार की अगाध उपाधियाँ भरी हुई हैं, जो विशुद्ध प्रेम-पथ के पथिकों के हृदय में किसी भी प्रकार से नहीं आ सकती। [1]
कुछ लोगों का ऐसा मत है कि माहात्म्य का विचार करके ही साधन करना चाहिए। ये लोग अमूल्य समयरूपी धन को प्रेम-पथ में न लगाकर साधारण फलों में व्यर्थ ही खो देते हैं। [2]
यद्यपि जिसे जैसा समझ में आता है, वह अपनी-अपनी समझ के अनुसार सब सत्य ही कहता है, किन्तु नटनागर श्रीबिहारीजी महाराज के प्रेम खजाने को ये लोग किसी भी प्रकार प्राप्त नहीं कर सकते। [3]
बेसमझी के कारण व्यर्थ ही ये वाद-विवाद करते हैं, क्योंकि सर्वोपरि नित्य-विहार-रस हमारे प्राणनाथ ललिता अवतार श्रीस्वामी हरिदास जी महाराज की कृपा के ही हाथ में है। [4]
कोउ कहै उद्दिम साधि उपाधि, अगाध सु बात कैसे उर आनैं।
कोउ कहै व्याज विचार करो तुम, कोउ धन कालहिं जात न जानैं॥ [1]
अपनी अपनी सब साँच कहैं, न लहैं नट नागर नेह निधानैं।
श्रीनागरीदासि के नाथ के हाथ, ए बादि बकैं बकवादि अयानैं॥ [2]
- श्री नागरीदेव जी, श्री नागरीदेव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (14)
कोई कहता है कि वेदोक्त विधि-विधान के अनुसार साधन-उद्यम करने से ही नित्य-विहार की प्राप्ति होती है, किन्तु इन साधनों में अनेक प्रकार की अगाध उपाधियाँ भरी हुई हैं, जो विशुद्ध प्रेम-पथ के पथिकों के हृदय में किसी भी प्रकार से नहीं आ सकती। [1]
कुछ लोगों का ऐसा मत है कि माहात्म्य का विचार करके ही साधन करना चाहिए। ये लोग अमूल्य समयरूपी धन को प्रेम-पथ में न लगाकर साधारण फलों में व्यर्थ ही खो देते हैं। [2]
यद्यपि जिसे जैसा समझ में आता है, वह अपनी-अपनी समझ के अनुसार सब सत्य ही कहता है, किन्तु नटनागर श्रीबिहारीजी महाराज के प्रेम खजाने को ये लोग किसी भी प्रकार प्राप्त नहीं कर सकते। [3]
बेसमझी के कारण व्यर्थ ही ये वाद-विवाद करते हैं, क्योंकि सर्वोपरि नित्य-विहार-रस हमारे प्राणनाथ ललिता अवतार श्रीस्वामी हरिदास जी महाराज की कृपा के ही हाथ में है। [4]

