जाकों दरस अति दुर्लभो, परसन परम अगाध।
ए सौंधे स्वादी बादि हीं, मन में मारत साध॥
- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (644)
जिस नित्य-बिहार का दर्शन अति ही दुर्लभ है और उसका स्पर्श तो परम कठिन है। जिसमें ये साधारण स्वाद के लोभी लोग बेकार ही अपने मन में आशा लगाए बैठे हैं। अर्थात इस नित्य विहार की प्राप्ति के लिए इसका अनन्य उपासक बनना पड़ता है।
ए सौंधे स्वादी बादि हीं, मन में मारत साध॥
- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (644)
जिस नित्य-बिहार का दर्शन अति ही दुर्लभ है और उसका स्पर्श तो परम कठिन है। जिसमें ये साधारण स्वाद के लोभी लोग बेकार ही अपने मन में आशा लगाए बैठे हैं। अर्थात इस नित्य विहार की प्राप्ति के लिए इसका अनन्य उपासक बनना पड़ता है।

