(कवित्त)
प्यारी की सहेली निज जानिकें सुजान लाल,
डाल गलवाँहीं अति प्रेम विलसंत है। [1]
नाना भाँति रास रस करत विलास हित,
प्यारी पद-पंकज में होय हुलसंत है॥ [2]
हा हा कर विनती हू करत है बार-बार,
हारिकें अपनपौ अरु प्रीति सरसंत है। [3]
मेरौ जे मधुप मन किशोरी जू चरण माँहि,
रहै नित निरंतर ठौर नहिं अन्त है॥ [4]
- श्री हित किशोरी लाल, राधा सुधा निधि स्तव (55)
मुझे अपनी प्यारी श्री राधा की सखी जानकर चतुर शिरोमणि श्रीलाल जी (श्रीकृष्ण) अत्यन्त प्रेमपूर्वक मेरे गले में बाँहें डालकर प्रेम-क्रीड़ा करते हैं। [1]
यह जानकार कि मेरा मन श्री राधा के चरणों में आसक्त है, मेरे सुख के लिए श्यामसुंदर अनेक प्रकार से रास-रस के प्रेममय विलास करते हैं [2]
वे बार-बार दीन होकर प्रार्थना करते हैं और स्वयं को पूरी तरह न्यौछावर कर अपनी प्रीति को और अधिक प्रगाढ़ करते हैं। [3]
परन्तु इतना सब होते हुए भी मेरा मन एक क्षण के लिए भी श्री राधा महारानी के चरणों के रस से विलग नहीं होता अर्थात मेरा यह भ्रमररूपी मन तो श्री किशोरी जू के चरणों में ही सदा निरन्तर आसक्त रहता है, उसके लिए अन्य कहीं कोई ठौर नहीं है। [4]
प्यारी की सहेली निज जानिकें सुजान लाल,
डाल गलवाँहीं अति प्रेम विलसंत है। [1]
नाना भाँति रास रस करत विलास हित,
प्यारी पद-पंकज में होय हुलसंत है॥ [2]
हा हा कर विनती हू करत है बार-बार,
हारिकें अपनपौ अरु प्रीति सरसंत है। [3]
मेरौ जे मधुप मन किशोरी जू चरण माँहि,
रहै नित निरंतर ठौर नहिं अन्त है॥ [4]
- श्री हित किशोरी लाल, राधा सुधा निधि स्तव (55)
मुझे अपनी प्यारी श्री राधा की सखी जानकर चतुर शिरोमणि श्रीलाल जी (श्रीकृष्ण) अत्यन्त प्रेमपूर्वक मेरे गले में बाँहें डालकर प्रेम-क्रीड़ा करते हैं। [1]
यह जानकार कि मेरा मन श्री राधा के चरणों में आसक्त है, मेरे सुख के लिए श्यामसुंदर अनेक प्रकार से रास-रस के प्रेममय विलास करते हैं [2]
वे बार-बार दीन होकर प्रार्थना करते हैं और स्वयं को पूरी तरह न्यौछावर कर अपनी प्रीति को और अधिक प्रगाढ़ करते हैं। [3]
परन्तु इतना सब होते हुए भी मेरा मन एक क्षण के लिए भी श्री राधा महारानी के चरणों के रस से विलग नहीं होता अर्थात मेरा यह भ्रमररूपी मन तो श्री किशोरी जू के चरणों में ही सदा निरन्तर आसक्त रहता है, उसके लिए अन्य कहीं कोई ठौर नहीं है। [4]

