हमें शास्त्र की समझ न परि हैं - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह) जी की वाणी, छूटक पद (153)

हमें शास्त्र की समझ न परि हैं - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह) जी की वाणी, छूटक पद (153)

हमें शास्त्र की समझ न परि हैं।
नहिं समझे अबहू नहिं समझे, जे समझे तिन कह्यो सु करि हैं॥ [1]
परम धर्मवेत्ता आचारज, न्यारनि ही कैं मत अनुसरि हैं।
हंस बाहनी हठ सलिता में, बूड़क लै लै नाहिं उछरि हैं॥ [2]
ब्रजरस-केलि सुधा पिय कैं फिर, विद्यावादनि नाहिं झगरि हैं।
नागरिदास बास वृन्दावन, नितविहार तैं कबहु न टरि हैं॥ [3]

- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह), श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (153)

हमें शास्त्रों की समझ नहीं है। न हम पहले समझे और न ही अब तक समझ पाए हैं। जिन्होंने शास्त्रों के वास्तविक मर्म (अर्थात अनन्य भाव से भजन) को समझा है, उन्होंने जो करने को कहा है, हम वही करेंगे। [1]

हम परम धर्मवेत्ता आचार्यों के उस निराले मत का ही अनुसरण करेंगे, जो अनन्य रसिकों का मत है। हंसवाहिनी सरस्वती अर्थात् विद्या की धारा में बार-बार डुबकियाँ लगाकर व्यर्थ नहीं उलझेंगे। [2]

ब्रजरस की केलि रूपी अमृत-रस का पान करके फिर विद्या और मत-मतान्तर के वाद-विवादों में नहीं झगड़ेंगे। नागरीदास जी कहते हैं कि हम श्रीवृन्दावन में वास करते हुए नित्यविहार से कभी विमुख नहीं होंगे और उसी का अनन्य रूप से भजन-गान करेंगे। [3]